जाते-जाते सबको रुला गए "लोकेश भैया",छोड़ गए मुस्कुराता चेहरा, "भैया" शब्द का अपनापन और जीवन भर की अमिट छाप
तीन सेकंड में थम गई जिंदगी… कैमरे में कैद हुआ ऐसा मंजर जिसने हजारों लोगों को जीवन का सबसे बड़ा सच दिखा दिया«
"कुछ लोग मौत से नहीं हारते,
वे अपने व्यवहार से अमर हो जाते हैं।
शरीर चला जाता है,
लेकिन उनकी मुस्कान,
उनका अपनापन और
उनके संस्कार हमेशा जीवित रहते हैं।"»
✒️विशेष श्रद्धांजलि|छिंदवाड़ा | उग्रप्रभा समाचार संपादक - नीलेश डेहरिया
गुरुवार की रात लगभग 10 बजकर 40 मिनट… समय अपनी रफ्तार से चल रहा था। किसी को अंदाज़ा भी नहीं था कि अगले ही कुछ क्षणों में छिंदवाड़ा एक ऐसा चेहरा खो देगा, जिसकी मुस्कान हजारों लोगों के दिलों में बसती थी।मौत का वह हृदय विदारक मंजर कैमरे में कैद हो गया। जिसने भी देखा, उसकी रूह कांप उठी। कुछ ही सेकंड में एक स्वस्थ, हँसता-मुस्कुराता, समाज और राजनीति में सक्रिय चेहरा हमेशा के लिए खामोश हो गया। उस वीडियो ने हर किसी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर जीवन का भरोसा ही क्या है? कब, कहाँ और किस रूप में मृत्यु सामने खड़ी हो जाए, इसका अनुमान कोई नहीं लगा सकता।
मौत ने उन्हें संभलने का अवसर नहीं दिया…
अपनों से अंतिम बार कुछ कहने का समय नहीं दिया…अपने दर्द को व्यक्त करने का मौका नहीं दिया…न किसी डॉक्टर तक पहुँचने का अवसर मिला और न ही उपचार का…महज़ कुछ क्षणों में जीवन का दीपक बुझ गया।धन, पद, प्रतिष्ठा, लोकप्रियता, पहचान—सब कुछ उस अंतिम क्षण में बेबस दिखाई दिया। यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। इंसान सारी उम्र भविष्य की योजनाएँ बनाता रहता है, लेकिन नियति का एक निर्णय पल भर में सब कुछ बदल देता है।
"भैया…"केवल एक संबोधन नहीं, उनका व्यक्तित्व था
स्वर्गीय लोकेश डेहरिया का परिचय केवल उनके पदों से नहीं था। उनकी असली पहचान उनका व्यवहार था।वे छोटे हों या बड़े, गरीब हों या संपन्न, किसान हों या अधिकारी, कर्मचारी हों या जनप्रतिनिधि—हर किसी को एक ही आत्मीयता से संबोधित करते थे—"भैया…
"उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। बातचीत में विनम्रता, व्यवहार में सरलता और हर व्यक्ति के प्रति सम्मान—यही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूँजी थी।कई बार मंचों से उनकी आलोचना हुई। सोशल मीडिया पर कटु टिप्पणियाँ भी हुईं। कुछ लोगों ने उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास भी किया। लेकिन जिन्होंने उन्हें करीब से जाना, वे जानते हैं। वे हर बात को मुस्कुराकर टाल देते थे।
जो हर किसी को अपना बना ले,वही सच्चा नेता कहलाता है।"»आज लोग उन्हें उनके पदों से कम, उनके व्यवहार से अधिक याद कर रहे हैं।
किसी को उनका पार्षद होना याद है…
किसी को भाजपा का नेता होना…
किसी को समाज का जिलाध्यक्ष होना…
लेकिन सबसे अधिक याद आ रहा है तो उनका मुस्कुराता चेहरा और हर मिलने वाले से कहा जाने वाला वह आत्मीय शब्द—
"कैसे हो भैया…?"नमस्ते
आज वही शब्द हजारों लोगों की स्मृतियों में गूँज रहे हैं। उनकी कमी केवल उनके परिवार ने नहीं, बल्कि पूरे समाज, संगठन और छिंदवाड़ा ने महसूस की है।
मेहरा डेहरिया समिति के संस्थापक सदस्य सें भवन भूमि आंवटन और जिला अध्यक्ष तक का सफर
स्वर्गीय लोकेश डेहरिया केवल एक राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे, बल्कि समाज के ऐसे सेवक थे जिन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय लोगों के सुख-दुःख में सहभागी बनने के लिए समर्पित कर दिया। उनके लिए समाज सेवा कोई औपचारिकता नहीं थी, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा धर्म थी।
वर्ष 2014 में मेहरा डेहरिया समाज की नवीन समिति के गठन के समय से ही वे संस्थापक सदस्यों में शामिल रहे। संगठन के गठन के बाद वर्ष 2014 से 2021 तक जिला कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में समाज को संगठित करने का कार्य किया। इसके बाद वर्ष 2021 से 2024 तक सचिव के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया। संगठन में उनकी सक्रियता, निष्ठा और समाज के प्रति समर्पण को देखते हुए दिसंबर 2025 में हजारों समाजजनों की उपस्थिति में उन्हें मेहरा डेहरिया समाज, छिंदवाड़ा का जिलाध्यक्ष चुना गया।
समाज ने उनके भीतर केवल एक पदाधिकारी नहीं, बल्कि ऐसा नेतृत्व देखा जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति तक पहुँचने का संकल्प रखता था। यद्यपि नियति ने उन्हें पूरा कार्यकाल पूरा करने का अवसर नहीं दिया और लगभग 18 माह में ही यह यात्रा थम गई, लेकिन इतने कम समय में भी उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचने का निरंतर प्रयास किया।
उनके लिए कोई छोटा या बड़ा नहीं था। किसान, मजदूर, अधिकारी, कर्मचारी, व्यापारी, महिला, युवा और बुजुर्ग—हर व्यक्ति उनके लिए समान सम्मान का पात्र था।
यदि किसी स्वजातीय बंधु के घर विवाह होता तो लोकेश भैया सबसे पहले पहुँचने वालों में रहते। बेटी के जन्म की खुशियाँ हों, गृहप्रवेश हो, प्रतिष्ठान का शुभारंभ हो, जन्मदिन हो, सेवानिवृत्ति का अवसर हो, गंगा पूजन हो, बीमारी, दुर्घटना या किसी परिवार में मृत्यु का समाचार मिले—वे अपनी व्यस्तताओं को छोड़कर वहाँ पहुँचने का हरसंभव प्रयास करते थे।
उनका मानना था कि समाज केवल बैठकों और भाषणों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुःख में साथ खड़े रहने से मजबूत होता है।
"नेता वही नहीं जो मंच से बोले,
नेता वह भी होता है जो शोकसभा में चुपचाप कंधा देकर लौट आए।
लोकेश भैया ने यही राजनीति और यही समाज सेवा की।"
उनके कार्यकाल में समाज भवन में अनेक सफल सामाजिक एवं सांस्कृतिक आयोजन संपन्न हुए। वे चाहते थे कि समाज का प्रत्येक परिवार एक सूत्र में बंधे और नई पीढ़ी अपनी संस्कृति, परंपराओं और सामाजिक मूल्यों से जुड़ी रहे।
समाज में मतभेद भी रहे, आलोचनाएँ भी हुईं। हर संगठन में कुछ लोग टीका-टिप्पणी करने वाले होते हैं, लेकिन लोकेश भैया ने कभी आलोचना को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने विरोध का उत्तर विरोध से नहीं, बल्कि अपने कार्यों और व्यवहार से दिया। उनका विश्वास था कि समय सबसे बड़ा न्यायाधीश होता है।
समाज भवन का सपना साकार करने में निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
मेहरा डेहरिया समाज के शुरुआती वर्षों में समाज के पास अपना भवन तक नहीं था। बैठकें, सामाजिक कार्यक्रम और सामूहिक आयोजन करने के लिए स्थायी स्थान का अभाव था। समाज की इस आवश्यकता को समझते हुए स्वर्गीय लोकेश डेहरिया ने समाज भवन के निर्माण का संकल्प लिया। तत्कालीन छिंदवाड़ा विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री चौधरी चन्द्रभान सिंह के निकट सहयोगी होने के कारण उन्होंने समाज के लिए शासकीय भूमि आवंटित कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उस समय नगर निगम में भाजपा की सरकार थी तथा महापौर श्रीमती कांता सदरंग थीं। उनके सहयोग और जनप्रतिनिधियों के सकारात्मक प्रयासों से समाज भवन का मार्ग प्रशस्त हुआ।
भूमि आवंटित होने के बाद विधायक निधि, सांसद निधि, जनभागीदारी निधि सहित विभिन्न जनप्रतिनिधियों से आर्थिक सहयोग प्राप्त कराने में भी उन्होंने सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद समाज के स्वजातीय बंधुओं के आर्थिक सहयोग, जनसहभागिता और सामूहिक प्रयासों से समाज भवन का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ।
आज यह समाज भवन केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि समाज की एकता, सामूहिक संकल्प और स्वर्गीय लोकेश डेहरिया सहित अनेक समाजसेवियों के अथक प्रयासों का जीवंत प्रतीक बनकर खड़ा है। समाज के वरिष्ठजन आज भी इस योगदान को सम्मानपूर्वक स्मरण करते हैं।
वे अक्सर कहा करते थे—
"ईंटों से भवन बनते हैं,
लेकिन विश्वास से समाज बनता है।
लोकेश भैया ने दोनों को जोड़ने का काम किया।"
उनकी सबसे बड़ी पूँजी कोई पद नहीं था, बल्कि लोगों का विश्वास था। यही कारण है कि आज उनके जाने के बाद हर व्यक्ति यही कहता दिखाई देता है—
"ऐसे लोग बार-बार जन्म नहीं लेते।"
"आज घर-घर में सन्नाटा है,
हर आँख में नमी का पहरा है।
क्योंकि जिसने सबको 'भैया' कहकर अपनाया,
आज वही सबसे दूर चला गया है।"
«"कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते,व्यवहार से बनते हैं।
लोकेश भैया ने यही रिश्ता कमाया था—
"आज घर-घर में सन्नाटा है,हर आँख में नमी का पहरा है।क्योंकि जिसने सबको 'भैया' कहकर अपनाया,आज वही सबसे दूर चला गया है।"हजारों की तादाद में उनके अंतिम दर्शन के लिए लोग दूर-दूर से पहुँचे। कोई मुंबई से आया, कोई भोपाल से, तो कोई छिंदवाड़ा जिले के सुदूर गाँवों से। हर कोई नम आँखों से अपने प्रिय "लोकेश भैया" को अंतिम प्रणाम करने आया था। किसी को उनका मुस्कुराता चेहरा याद आ रहा था, किसी के कानों में उनका आत्मीय संबोधन "भैया…" गूँज रहा था, तो कोई उनके साथ बिताए पलों को याद कर मौन खड़ा था।उन्हें अंतिम विदाई देने उमड़ा जनसैलाब मानो जीवन का सबसे बड़ा संदेश दे रहा था। जीते-जी मतभेद हो सकते हैं, आलोचनाएँ हो सकती हैं, विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन मृत्यु वह अंतिम सत्य है जिसके सामने हर वैमनस्य स्वतः समाप्त हो जाता है।
"जीते जी जिसे समझ न सके,उसके जाने पर आँसू बहाते रहे।जिन लफ़्ज़ों में शिकायतें थीं कभी,वही होंठ आज श्रद्धांजलि सुनाते रहे।"
जीवन का यही कटु सत्य है कि जब मनुष्य जीवित होता है, तब उसके कार्यों की आलोचना करने वाले भी मिलते हैं, उसकी सफलता से असहज होने वाले भी मिलते हैं। किंतु जब वही व्यक्ति इस संसार से विदा हो जाता है, तब पद, प्रतिष्ठा, मतभेद और अहंकार सब पीछे छूट जाते हैं। अंत में याद रह जाता है तो केवल उसका व्यवहार, उसकी विनम्रता, उसका प्रेम और लोगों के दिलों में कमाया गया सम्मान।स्वर्गीय लोकेश डेहरिया का जीवन मानो यही संदेश देकर गया कि कटुता कभी किसी को महान नहीं बनाती, लेकिन प्रेम, सेवा, अपनापन और सद्व्यवहार मनुष्य को मृत्यु के बाद भी अमर कर देते हैं।"मृत्यु के आगे न कोई विरोध बचता है, न कोई वैमनस्य, न पद और न प्रतिष्ठा। अंततः मनुष्य के साथ केवल उसके कर्म चलते हैं। इसलिए जीवन में नफ़रत नहीं, प्रेम बाँटिए; आलोचना नहीं, सम्मान दीजिए; क्योंकि कौन-सी मुलाकात अंतिम मुलाकात बन जाए, यह कोई नहीं जानता।"शायद यही कारण था कि जिन लोगों ने कभी उनके साथ मतभेद रखे होंगे, वे भी उस दिन नम आँखों से उन्हें अंतिम प्रणाम कर रहे थे। क्योंकि अंततः इंसान की सबसे बड़ी पहचान उसका पद नहीं, बल्कि उसका व्यक्तित्व और उसके द्वारा कमाया गया सम्मान होता है।
संघर्ष से शिखर तक… एक साधारण कार्यकर्ता से भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा जिलाध्यक्ष बनने तक का सफर
"पेड़ जितना फलदार होता है, उतना ही झुक जाता है।
इंसान जितना बड़ा होता है, उतना ही विनम्र हो जाता है।
लोकेश भैया का जीवन इसी सत्य का जीवंत उदाहरण था।"
स्वर्गीय लोकेश डेहरिया का जन्म छिंदवाड़ा जिले के बनगांव के एक साधारण परिवार में हुआ। साधारण परिवेश में पले-बढ़े लोकेश भैया ने बचपन से ही संघर्ष को अपने जीवन का साथी बनाया। परिस्थितियाँ आसान नहीं थीं, लेकिन उनके हौसले हमेशा बड़े रहे।जीवन की जिम्मेदारियाँ बढ़ीं तो वे छिंदवाड़ा आए। किराए के एक छोटे से कमरे से उन्होंने अपने नए जीवन की शुरुआत की। सीमित संसाधन थे, लेकिन बड़े सपने थे। धीरे-धीरे मेहनत, ईमानदारी और लोगों के विश्वास के बल पर उन्होंने अपनी पहचान बनाई। समय के साथ उन्होंने सिद्धिविनायक कॉलोनी में अपना स्वयं का घर बनाया, जहाँ वे अपनी पत्नी, पुत्र और पुत्री के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहे थे।
"संघर्ष की धूप में जो तपते हैं,
वही सफलता की छाँव पाते हैं।
मंज़िल उन्हें नहीं मिलती जो राह बदल लेते हैं,
मंज़िल उन्हें मिलती है जो हर मुश्किल में मुस्कुराते हैं।"
समाज सेवा के साथ-साथ उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में अपनी राजनीतिक यात्रा प्रारंभ की। उन्होंने कभी पद की इच्छा से राजनीति नहीं की, बल्कि संगठन को परिवार मानकर पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ कार्य किया।लगभग दो दशकों तक उन्होंने पार्टी के लिए लगातार मेहनत की। बूथ स्तर से लेकर जिला स्तर तक संगठन की हर जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाया। कार्यकर्ताओं के सुख-दुःख में शामिल होना, संगठन के कार्यक्रमों को सफल बनाना और पार्टी की विचारधारा को जन-जन तक पहुँचाना उनकी दिनचर्या बन चुकी थी।उनकी मेहनत, अनुशासन और संगठन के प्रति समर्पण ने धीरे-धीरे उन्हें भाजपा के भरोसेमंद कार्यकर्ताओं की कतार में खड़ा कर दिया।
20 वर्षों की तपस्या के बाद मिला जनसेवा का अवसर
वर्ष 2022 में भारतीय जनता पार्टी ने उन पर विश्वास जताते हुए छिंदवाड़ा नगर निगम के वार्ड क्रमांक 47 से पार्षद पद का उम्मीदवार बनाया। यह केवल एक टिकट नहीं था, बल्कि दो दशक की निष्ठा, संघर्ष और संगठन के प्रति समर्पण का सम्मान था।
जनता ने भी उन पर विश्वास व्यक्त किया और 17 जुलाई 2022 को वे नगर निगम के पार्षद निर्वाचित हुए।पार्षद बनने के बाद भी उनके व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। पद मिलने के बाद भी उन्होंने कभी पद का अहंकार नहीं किया। वे पहले की तरह लोगों के बीच जाते रहे, समस्याएँ सुनते रहे और उनके समाधान के लिए लगातार प्रयास करते रहे।वार्ड के विकास कार्यों को गति देना, नागरिक सुविधाओं का विस्तार करना और बिना किसी भेदभाव के हर नागरिक से मिलना उनकी कार्यशैली का हिस्सा था। लोग उन्हें केवल पार्षद नहीं, बल्कि अपने परिवार का सदस्य मानते थे।
"कुर्सियाँ इंसान को बड़ा नहीं बनातीं,
बड़ा उसका व्यवहार बनाता है।
इसलिए आज पद नहीं,
लोकेश भैया का स्वभाव याद किया जा रहा है।"
भाजपा संगठन में लगातार बढ़ता गया कद
नगर निगम पार्षद बनने के साथ-साथ भाजपा संगठन में भी उनकी सक्रियता लगातार बढ़ती गई।वर्ष 2022 से 2026 तक उन्होंने भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा, छिंदवाड़ा के जिला कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में संगठन को मजबूती देने का कार्य किया। उन्होंने जिलेभर में कार्यकर्ताओं को जोड़ने, संगठन को सक्रिय बनाने और समाज के बीच भाजपा की विचारधारा को मजबूत करने के लिए लगातार दौरे किए।उनकी कार्यशैली, सादगी, सक्रियता और प्रदेश नेतृत्व के साथ बेहतर समन्वय को देखते हुए मई 2026 में उन्हें भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा, छिंदवाड़ा का जिलाध्यक्ष नियुक्त किया गया।यह समाचार केवल भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए ही नहीं, बल्कि समाज के हजारों लोगों के लिए भी गर्व और खुशी का विषय था। सभी को विश्वास था कि लोकेश भैया के नेतृत्व में संगठन और अधिक मजबूत होगा।जिलाध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने नई कार्यकारिणी के गठन की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी थी। जिलेभर से कार्यकर्ताओं के सुझाव लेकर नई टीम की सूची लगभग तैयार हो चुकी थी। केवल औपचारिक स्वीकृति और घोषणा शेष थी।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था...
जिस व्यक्ति ने संगठन के विस्तार का सपना देखा था, उसका जीवन ही अचानक थम गया।नई कार्यकारिणी का विस्तार अब अधूरा रह गया और संगठन का एक समर्पित, कर्मठ और लोकप्रिय चेहरा हमेशा के लिए मौन हो गया।
"किसे पता था कि जिस हाथ से नई टीम की सूची लिखी जा रही है,वही हाथ कुछ ही दिनों बाद हमेशा के लिए शांत हो जाएगा। नियति ने ऐसी रेखा खींची कि संगठन का विस्तार तो रुक गया,लेकिन लोकेश भैया का व्यक्तित्व हजारों दिलों में हमेशा के लिए विस्तार पा गया।"
अंतिम विदाई में उमड़ा जनसैलाब… नम आँखों से हर किसी ने कहा—"अलविदा लोकेश भैया"
«"कुछ लोग मरते नहीं, अमर हो जाते हैं,
क्योंकि उनका जीवन केवल उनका नहीं, हजारों लोगों का हो जाता है।"»स्वर्गीय लोकेश डेहरिया के असामयिक निधन की खबर जैसे ही छिंदवाड़ा सहित प्रदेशभर में फैली, लोगों के लिए इस पर विश्वास करना कठिन हो गया। जिसने कुछ घंटे पहले उनसे मुलाकात की थी, जिसने फोन पर बातचीत की थी, जिसने उनके साथ चाय पी थी, जिसने उनके साथ बैठकर संगठन और समाज की योजनाओं पर चर्चा की थी—हर कोई यही कह रहा था, "ऐसा कैसे हो सकता है?"
लेकिन नियति का निर्णय अटल था।
धीरे-धीरे यह दुखद समाचार पूरे जिले, प्रदेश और बाहर रहने वाले परिचितों तक पहुँचा। मुंबई, भोपाल और अन्य शहरों से भी लोग तत्काल छिंदवाड़ा के लिए रवाना हो गए, ताकि अपने प्रिय लोकेश भैया के अंतिम दर्शन कर सकें।उनके निवास पर लोगों का ताँता लग गया। हर आने वाला व्यक्ति कुछ पल उन्हें देखता, फिर अपने आँसू रोक नहीं पाता। कोई उनके चरणों में पुष्प अर्पित कर मौन खड़ा था, कोई परिवार को ढांढस बंधा रहा था, तो कोई उनके साथ बिताए वर्षों की यादें सुनाते-सुनाते भावुक हो उठता था।
«"वो चेहरा आज भी आँखों में मुस्कुराता है,
वो 'भैया' कहकर बुलाना आज भी कानों में गूंज जाता है।यकीन ही नहीं होता कि जो कल तक साथ था,आज वही तस्वीर बनकर रह गया।"»उनकी अंतिम यात्रा में हजारों की संख्या में लोग उमड़ पड़े। सांसद विवेक (बंटी) साहू, भाजपा जिलाध्यक्ष शेषराव यादव, पूर्व कैबिनेट मंत्री चौधरी चंद्रभान सिंह, पूर्व विधायक ताराचंद बवारिया, भाजपा के वरिष्ठ पदाधिकारी, नगर निगम के सभापति एवं पार्षदगण, अधिकारी-कर्मचारी तथा मेहरा डेहरिया समाज के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष श्री राधेलाल डेहरिया, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं वर्तमान संरक्षक श्री बृजेश वट्ट, प्रदेश अध्यक्ष श्री जागेश्वर सुर्जे, वरिष्ठ समाजसेवी श्री जीवन डेहरिया सहित छिंदवाड़ा जिले के कोने-कोने से हजारों समाजजन अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करने पहुँचे। अंतिम यात्रा में उमड़ा जनसैलाब इस बात का साक्षी था कि लोकेश भैया ने अपने व्यवहार और सेवा से लोगों के दिलों में कितना बड़ा स्थान बनाया था।
उस दिन केवल एक परिवार नहीं रो रहा था…
एक समाज रो रहा था…
एक संगठन रो रहा था…
एक वार्ड रो रहा था…
और पूरा छिंदवाड़ा अपने "लोकेश भैया" को अंतिम विदाई दे रहा था।
«"भीड़ बहुत थी अंतिम यात्रा में,
मगर हर आँख अकेली थी।
क्योंकि जिसने सबको अपना बनाया,
आज उसी की विदाई की बेला थी।"»
उनका जाना केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्तित्व का अवसान है जिसने अपने व्यवहार, विनम्रता, सेवा और समर्पण से लोगों के दिलों में स्थायी स्थान बनाया।आज उनके परिवार की पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं की जा सकती। एक पत्नी ने अपना जीवनसाथी खो दिया, एक बेटे और बेटी ने अपना पिता खो दिया, माता-पिता और परिजनों ने अपना सहारा खो दिया। वहीं समाज ने अपना नेतृत्व, संगठन ने अपना कर्मठ कार्यकर्ता और छिंदवाड़ा ने अपना लोकप्रिय जनप्रतिनिधि खो दिया।
«"मंज़िलें छूट गईं, सफर अधूरा रह गया,
जाने वाला अपनों से बहुत दूर चला गया।
मगर उसकी मुस्कान, उसका अपनापन और उसके संस्कार
हर दिल में हमेशा के लिए बस गए।"»
स्वर्गीय लोकेश डेहरिया का जीवन हमें एक अमूल्य सीख देकर गया है—पद से बड़ा व्यवहार होता है, राजनीति से बड़ी मानवता होती है और सफलता से बड़ा सद्व्यवहार होता है।जीवन अनिश्चित है। यदि किसी से मतभेद हो तो उसे मनभेद मत बनने दीजिए। प्रेम कीजिए, सम्मान दीजिए और क्षमा करना सीखिए। कौन-सी मुलाकात अंतिम मुलाकात बन जाए, यह कोई नहीं जानता।
«"जो इंसान दिलों में घर बना ले,
उसे मौत भी मिटा नहीं सकती।
शरीर पंचतत्व में विलीन हो जाता है,
लेकिन अच्छे कर्म पीढ़ियों तक जीवित रहते हैं।"»
आज भले ही लोकेश भैया हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका मुस्कुराता चेहरा, उनका आत्मीय संबोधन—"भैया…", उनका संघर्ष, उनकी सादगी, समाज के प्रति समर्पण और सेवा का भाव आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बना रहेगा।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव सहित भाजपा के शीर्ष नेताओं ने सोशल मीडिया पर दी भावभीनी श्रद्धांजलि
स्वर्गीय लोकेश डेहरिया के असामयिक निधन पर प्रदेशभर में शोक की लहर दौड़ गई। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल, मध्यप्रदेश शासन के कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, कैबिनेट मंत्री राकेश सिंह, मध्यप्रदेश अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष डॉ. कैलाश जाटव सहित भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेताओं, सांसदों, विधायकों एवं पदाधिकारियों ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर स्वर्गीय लोकेश डेहरिया का छायाचित्र साझा करते हुए गहरा शोक व्यक्त किया।
नेताओं ने अपने श्रद्धांजलि संदेशों में स्वर्गीय लोकेश डेहरिया को भाजपा का समर्पित कार्यकर्ता, कर्मठ जनप्रतिनिधि, मिलनसार व्यक्तित्व एवं समाजसेवा के लिए समर्पित नेता बताते हुए उनके असामयिक निधन को भाजपा परिवार, मेहरा डेहरिया समाज और छिंदवाड़ा जिले के लिए अपूरणीय क्षति बताया। साथ ही शोकाकुल परिवार के प्रति गहरी संवेदनाएँ व्यक्त करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।
उग्रप्रभा समाचार परिवार स्वर्गीय लोकेश डेहरिया जी को विनम्र, अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करता है।
«"अलविदा लोकेश भैया…
आपने छोटी-सी उम्र में बहुत बड़ा जीवन जी लिया।आपकी मुस्कान, आपका अपनापन और आपके संस्कार सदैव जीवित रहेंगे।ईश्वर आपकी पुण्य आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।"»
**भावभीनी श्रद्धांजलि।
ॐ शांति।**
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