18 माह की उम्र में माता-पिता का साया खोने वाला बालक बना उपायुक्त आयुक्त (क्लास-वन अधिकारी)
***"न माँ की गोद मिली, न पिता का हाथ मिला,
जीवन भर बस संघर्षों का साथ मिला।
मगर हौसलों की लौ कभी बुझने न दी,
कठिनाइयों के आगे सिर कभी झुकने न दिया।
आज वही अनाथ बालक मिसाल बन गया,
मेहनत, शिक्षा और संघर्ष का कमाल बन गया।"***
संघर्ष, संकल्प और सफलता की प्रेरणादायी गाथा : श्री एन. एस. बरकडे
"जिसने बचपन में माँ-बाप खो दिए, उसने हार नहीं मानी... संघर्ष को सीढ़ी बनाकर सफलता की बुलंदियों को छू लिया।"
छिंदवाड़ा जिले में आदिम जाति कल्याण विभाग में सहायक आयुक्त के रूप में पदस्थ रहे एंव वर्तमान उपायुक्त जबलपुर जनजातीय कार्य विभाग श्री नरोत्तम सिंह बरकडे आज हजारों विद्यार्थियों और युवाओं के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। उनका जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, यदि मन में दृढ़ संकल्प, अथक परिश्रम और शिक्षा के प्रति समर्पण हो तो सफलता स्वयं कदम चूमती है।
जन्म और बचपन का संघर्ष
श्री नरोत्तम बरकडे का जन्म 2 अप्रैल 1970 को मध्यप्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम सरेखा कला में एक साधारण किसान-मजदूर आदिवासी परिवार में हुआ। उनके पिता स्वर्गीय श्री गोनसिंग बरकडे एवं माता स्वर्गीय श्रीमती ब्रजकुवर बाई मेहनत-मजदूरी कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
जब नरोत्तम मात्र 18 माह के थे, तब उनके पिता जंगल से लकड़ी लाने गए हुए थे। अचानक तेज बारिश और आकाशीय बिजली गिरने से उनका दुखद निधन हो गया। परिवार इस असहनीय पीड़ा से उबर भी नहीं पाया था कि तीन माह बाद उनकी माता का भी देहांत हो गया।
महज डेढ़ वर्ष का बेटा और तीन वर्ष की बेटी एक ही झटके में अनाथ हो गए।
जिस उम्र में बच्चे माता-पिता की उंगली पकड़कर चलना सीखते हैं, उस उम्र में नरोत्तम और उनकी बड़ी बहन मुन्नी बाई ने जीवन का सबसे बड़ा दुःख सहा। उन्हें इतना भी याद नहीं कि उनके माता-पिता का चेहरा कैसा था।
इसके बाद रिश्तेदारों ने दोनों बच्चों को उनके मामा-मामी की शरण में सौंप दिया। मामा-मामी ने उन्हें अपने बच्चों की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। बचपन में वे उन्हें ही अपने माता-पिता समझते रहे। बाद में जब समझ विकसित हुई, तब उन्हें पता चला कि जिनके स्नेह और संरक्षण में वे बड़े हो रहे हैं, वे उनके मामा-मामी हैं।
अभावों के बीच शिक्षा की अलख
अत्यंत गरीबी और संघर्षपूर्ण परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।
प्राथमिक शिक्षा शासकीय प्राथमिक शाला सरेखा में तथा माध्यमिक एवं हायर सेकेंडरी शिक्षा छात्रावास में रहकर पूर्ण की। इसके बाद बरघाट शासकीय महाविद्यालय से वर्ष 1992 में बी.ए. की उपाधि प्राप्त की।
पढ़ाई के दौरान आर्थिक तंगी इतनी थी कि कई बार जंगल से लकड़ी, घास और भूसा बेचकर अपनी जरूरतें पूरी करनी पड़ती थीं। लेकिन अभाव उनके हौसलों को नहीं तोड़ सके।
संघर्ष से सफलता तक का सफर
स्नातक की पढ़ाई पूर्ण करने के बाद उन्होंने अपने जीवन को नई दिशा देने का संकल्प लिया।
सबसे पहले उनका चयन उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर हुआ। लेकिन यह तो उनकी सफलता की शुरुआत थी।
वर्ष 1993 में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में ADEO के पद पर चयन हुआ। इसके बाद उन्होंने मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग (PSC) की परीक्षा दी और पहले ही प्रयास में सफलता अर्जित कर सहकारिता निरीक्षक के पद पर चयनित हुए।
उन्होंने यहीं रुकना स्वीकार नहीं किया। पुनः पीएससी परीक्षा में सफलता अर्जित कर वर्ष 1999 में जिला संयोजक, आदिम जाति कल्याण विभाग के पद पर चयनित हुए।
उनकी मेहनत, ईमानदारी और उत्कृष्ट कार्यशैली के कारण वर्ष 2004 में उन्हें सहायक आयुक्त के पद पर पदोन्नति प्राप्त हुई। विभिन्न जिलों में सेवाएं देने के बाद वर्तमान में वे छिंदवाड़ा जिले में सहायक आयुक्त, आदिम जाति कल्याण विभाग के रूप में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे हैं।
विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत
श्री बरकडे केवल एक प्रशासनिक अधिकारी नहीं, बल्कि संघर्ष और सफलता की जीवंत पाठशाला हैं।
वे समय-समय पर छात्रावासों में जाकर विद्यार्थियों को अपनी जीवन यात्रा सुनाते हैं और बताते हैं कि—
"परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन हों, शिक्षा और आत्मविश्वास कभी मत छोड़ो। सफलता देर से मिलेगी, लेकिन जरूर मिलेगी।"
उनकी जीवन गाथा सुनकर अनेक विद्यार्थियों को आगे बढ़ने की नई ऊर्जा और प्रेरणा मिलती है।
परिवारिक जीवन
वर्ष 1995 में उन्होंने वैवाहिक जीवन में प्रवेश किया। उनकी धर्मपत्नी भी शासकीय शिक्षिका हैं।
आज उनके परिवार में दो पुत्र एवं एक पुत्री हैं। पुत्र और पुत्री स्नातक शिक्षा पूर्ण कर दिल्ली में रहकर UPSC (IAS/IPS) की तैयारी कर रहे हैं। सबसे छोटा पुत्र अध्ययनरत है।
उनकी बड़ी बहन मुन्नी बाई, जिन्होंने बचपन से उन्हें माँ और बहन दोनों का स्नेह दिया, आज स्वयं शिक्षिका के पद पर सेवाएं दे रही हैं।
प्रेरणा का संदेश
श्री एन. एस. बरकडे का जीवन बताता है कि गरीबी, अभाव, अनाथपन और कठिन परिस्थितियाँ किसी व्यक्ति की मंजिल तय नहीं करतीं। मंजिल तय करता है उसका संघर्ष, उसका आत्मविश्वास और उसकी मेहनत।
***"किस्मत ने बचपन में बहुत कुछ छीन लिया था,
मगर हौसलों ने हर सपना फिर से बुन लिया था।
अंधेरों ने लाख कोशिश की राह रोकने की,
लेकिन संघर्ष ने उजालों का रास्ता चुन लिया था।"***
***"मंज़िल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है,
पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।"***
18 माह की उम्र में माता-पिता को खो देने वाला एक बालक आज हजारों विद्यार्थियों की प्रेरणा और समाज के लिए एक आदर्श बन चुका है। श्री एन. एस. बरकडे की जीवन यात्रा संघर्ष से सफलता तक की ऐसी अमिट कहानी है, जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
✍️ संकलनकर्ता : नीलेश डेहरिया
प्रधान संपादक – उग्र प्रभा समाचार, छिंदवाड़ा (मध्यप्रदेश)
18 माह की उम्र में माँ - बाप को खोने के बाद भी श्री एन एस बरकडे कढी मेहनत संघर्ष करके सहायक आयुक्त(क्लास वन अधिकारी) के पद पर पंहुचे
*सफलता की प्रेरणा दायिक मार्मिक सच्ची कहानी*
*आदिम जाति कल्याण विभाग छिंदवाड़ा में पदस्थ सहायक आयुक्त श्री एन एस बरकडे के संघर्ष भरा बचपन से कमिश्नर तक का सफरनामा*
जीवन परिचय - श्री नरोत्तम बरकडे का जन्म 02 अप्रेल 1970 को एक किसान मजदूर परिवार पिता श्री गोनसिंग बरकडे एवं माता श्रीमती ब्रजकुवर बाई के घर ग्राम सरेखा कला थाना उंगली जिला सिवनी मध्यप्रदेश में एक आदिवासी परिवार में हुआ।माता पिता के अलावा आपकी एक बडी बहन मुन्नी बाई है जो आपसे ढेड साल उम में बडी है। पिताजी पेशे से किसान मजदूर थे। लकडी घास बेचकर परिवार का पालन पोषण करते थे। एक दिन पिता जी लकडी लाने के लिए जगंल गये हुए थे। और अचानक तेज बारिश के साथ आकाशीय बिजली की चपेट में आने के कारण पिता का देंहात हो गया तब नरोत्तम 18 माह के थे। पिता का भी चेहरा पहचानने समझने यौग्य नही थे।और पिता का छाया बेटा बेटी एवं पत्नी से उजड गया। घर की जिम्मेदारी अचानक माताजी पर आ गई। और संघर्ष करते करते पिता के देहांत के तीन माह बाद माता का भी देंहात हो गया। अब नरोत्तम एवं बडी बहन मुन्नी अनाथ हो चुके थी अभी भी माता पिता का चेहरा याद नही है। महज दो और तीन साल उम्र थी और ईश्वर ने इतना बडा दुख दोनो बहन भाइयो के सिर पर बोझ रख दिया, दोनो बच्चो को मामा मामी की शरण में रिश्तेदारों ने छोड दिया। नन्हीं सी उम्र में माता पिता को खोने के बाद मामा मामी को ही पुर्ण रुप से माता पिता समझने लगे मध्यकाल बचपन मे जब थोडी समझदारी आई तब रिस्तेदारो के माध्यम से पता चला कि आपके माता-पिता की मृत्यु हो चुकी है जो परवरिश कर है मामा मामी है। अत्यंत गरीबी परिस्थिति में लालन पालन पोषण हुआ फिर स्कूल में नाम दाखिला कराया गया।
*शिक्षा*- श्री नरोत्तम बरकडे की प्राथमिक शिक्षा शासकीय प्राथमिक शाला सरेखा मे हुई एवं माध्यमिक, हायर सेकंडरी शिक्षा शासकीय शाला सरेखा से छात्रावास मे रहकर हुई। कक्षा ग्यारहवीं में कला संकाय लेकर 12वी तक की पढाई पुर्ण की एवं स्नातक की पढाई बरघाट शासकीय महाविद्यालय से बीए सन 1992 मे पुर्ण किये । इन दिनो श्री नरोत्तम बरकडे को भारी समास्या का सामना करना पढा जंगल के सहारे लडकी घास भूस बेचकर अपनी आवश्यकता की पुर्ति करना पढा। स्नातक पुर्ण होने के बाद मेहनत और संघर्ष अनाथ जीवन सुखीमय जीवन में बदलने की कवायत शुरु हुई है और उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर पहली नौकरी लगी फिर किस्मत का पिटारा खुलता अह्सास हुआ और दो माह बाद पंचायत एवं ग्रामीण विभाग में ADEO के पद पर 1993 को चयन हुआ और शिक्षक की नौकरी छोड़कर ADEO की नौकरी मंडला जिले के मोहगांव जनपद मे 1993-95 तक किया । पहले बार सन 1993 को पीएससी की परीक्षा में बैठकर पहले ही प्रयास में सफलता हासिल की और सहकारिता निरीक्षण के पद पर सन 1995 को चयन हुआ। 1995-99 तक सहकारिता विभाग मे सेवा दियें। अब मन में कुछ बढा और बढने का सपना चलने लगा औरपुनः दूसरी बार सन 1996 में पीएससी की परीक्षा में बैठकर फिर सफलता कदमो में चूम गई। और सन 1999 में जिला संयोजक आदिम जाति कल्याण मंडला पर हुआ। बर्ष 2004 में सहायक आयुक्त के पद पर जबलपुर जिले में पदोन्नति हुई। एवं विभिन्न जिलों में सहायक आयुक्त के पद पर स्थानांतरण हुआ एवं वर्तमान में छिंदवाड़ा जिले में सहायक आयुक्त आदिम जाति कल्याण विभाग में पदस्थ है। कठिन वितरित परिस्थितियों की ठोकर खाकर आज आदिम जाति कल्याण विभाग कमिश्नर एन एस बरकडे के हाथो में छिंदवाड़ा जिले की बागडोर है प्री से लेकर पौस्ट मेट्रिक छात्रावासों में जाकर छात्रों को अपनी प्रेरणा दायिक मार्मिक जीवन गाथा सुनाते हैं ताकि समास्या या परिस्थितियों से ग्रस्त छात्र अपना मनोबल न खोये ना ही शिक्षा के मार्ग से भटके। विपरीत परिस्थितियों में भी रहकर सफलता को पाया जा सकता है जिसका में जीता जागता उदाहरण हूं। ऐसे उदाहरण देकर छात्रों का मनोबल बढाते है।
*परिवारिक जीवन*-सन 1995 को ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश किये। अपकी धर्मपत्नी भी शासकीय शिक्षिका है। आपके दाम्पत्य जीवन मे तीन संताने दो बेटा एवं एक बेटी के रुप मे पैदा हुई जो आज एक बेटा बेटी स्नातक बीए के पढाई पुर्ण करके यूपीएससी (IAS/IPS/) की तैयारी दिल्ली से कर रहे है। एक बेटा छोटा है। आपकी बडी बहन जो लगभग आपसे दो बर्ष बडी थी माँ और बहन का प्यार आपको दिया कढी मेहनत संघर्ष परिश्रम करके आज बहन भी शिक्षिका के पद पर पदस्थ है।
संकलनकर्ता -नीलेश डेहरिया
*प्रधान संपादक उग्र प्रभा समाचार छिंदवाड़ा मध्यप्रदेश*
