मोहिता जगदेव
उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा
*15 दिन के एकांतवास में पहुंचे भगवान जगन्नाथ, 'अनासार गृह' में राजवैद्य चिकित्सक दंपत्ति शुरू करेंगे उपचार*
उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा: वर्धमानेश्वर मंदिर में महास्नान के पावन अनुष्ठान के पश्चात, भगवान जगन्नाथ, भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा वापस वर्धमान सिटी स्थित अपनी 'जगन्नाथ आराधना स्थली' (पंडित विजय आनंद दुबे जी का निवास स्थान) लौट आए हैं। आराधना स्थली पहुंचते ही अत्यधिक जल के प्रभाव के कारण महाप्रभु अस्वस्थ (ज्वर से पीड़ित) हो गए हैं। आदि गुरु शंकराचार्य परंपरा और गोवर्धन पीठ (पुरी) की मूल उत्कल संस्कृति के अनुसार पूजन-पाठ की मर्यादाओं का पालन करते हुए प्रभु को तत्काल यहीं 'अनासार गृह' (एकांतवास) में भेज दिया गया है, जहां प्रामाणिक वैदिक परंपरा के अनुसार उनका औषधीय उपचार चक्र प्रारंभ हो रहा है।
*वैदिक व आयुर्वेद परंपरा से होगा महाप्रभु का उपचार, पदाधिकारियों ने दी विस्तृत जानकारी*
आयोजन के मुख्य सूत्रधार और भगवान जगन्नाथ जी के अनन्य भक्त पंडित स्पंदन आनंद दुबे ने बताया कि छिंदवाड़ा में विगत 30 वर्षों से अनवरत चल रहे इस दिव्य उत्सव में पूजन-पाठ और समस्त धार्मिक गतिविधियां पूर्णतः शंकराचार्य परंपरा के अंतर्गत वैदिक मर्यादाओं के अधीन आयोजित होती हैं। वर्तमान में भगवान के अस्वस्थ होने पर सनातन की मूल वैदिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार उनका 'गुप्त उपचार' किया जा रहा है। आगामी गुप्त वास के दौरान महाप्रभु के उपचार के लिए विशेष रूप से आमंत्रित दो वरिष्ठ चिकित्सक दंपत्ति यहाँ पहुँचकर राजवैद्य की भूमिका संभालेंगे। इनमें वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. कंचन - डॉ. जी.एस. दुबे एवं डॉ. निधि - डॉ. प्रणय सोनी शामिल हैं। समिति के कार्यकारी अध्यक्ष राजेंद्र आचार्य ने आगे विशेष जानकारी देते हुए बताया कि वैदिक परंपरा के अनुसार इस अस्वस्थता काल में छप्पन भोग पूरी तरह बंद रहेगा और प्रभु को केवल फलों का रस, सादा छैना व 'अणासरा पणा' (शीतल पेय) जैसे सादे पथ्य भोग ही अर्पित किए जाएंगे। महाप्रभु की शारीरिक शक्ति को पुनः लौटाने के लिए एकादशी की पावन तिथि पर विशेष रूप से तैयार किए गए औषधीय 'दशमूल कंद लड्डू' का मुख्य भोग लगाया जाएगा। अंत में 'बनका लागी' विधि द्वारा प्राकृतिक लेप से प्रभु का श्रृंगार कर उन्हें पूर्ण स्वस्थ किया जाएगा। समिति के प्रवक्ता अभिनव श्रीवास्तव ने बताया कि सनातन मूल परंपरा के अनुसार, इन आगामी 15 दिनों तक भगवान भक्तों को दर्शन नहीं देंगे और मंदिर के कपाट पूरी तरह बंद रहेंगे। हालांकि अनासार गृह में जाने के बाद भगवान जगन्नाथ का पहला दिन से ही 'पट्टी दियां' नामक पटाचित्र का पूजन होता है। जिसमें भगवान जगन्नाथ जी को श्री महानारायण, श्री बलभद्र जी को अनंत वासुदेव एवं श्रीमाता सुभद्रा को भुवनेश्वरी और राजराजेश्वरी के रूप में पूजे जाने का विधान हैं। इन दिनों में मदन मोहन जी भक्तजनों को दर्शन देते हैं। पूरे छिंदवाड़ा के सनातनी भक्त इस समय भगवान के शीघ्र स्वस्थ होने और उनके दिव्य 'नवयौवन रूप' के दर्शनों की व्याकुलता से प्रतीक्षा कर रहे हैं।
*अनासार गृह के इन 15 दिनों के पवित्र और शास्त्रीय उपचार चक्र की दैनिक गतिविधियां इस प्रकार रहेंगी:*
🔹 प्रथम दिन: अनासार प्रवेश (पट बंद) - महाप्रभु का एकांतवास प्रारंभ, दर्शन पूरी तरह बंद।
🔹 दूसरा दिन: राजवैद्य परामर्श - चिकित्सक दंपत्तियों द्वारा महाप्रभु का स्वास्थ्य परीक्षण।
🔹 तीसरा दिन: पथ्य भोग प्रारंभ - राजसी छप्पन भोग बंद, केवल फलों का हल्का रस अर्पण।
🔹 चौथा दिन: अणसर पण अर्पण - विशेष जड़ी-बूटियों से युक्त शीतल पेय का भोग।
🔹 पांचवां दिन: फुलुरी तेल सेवा - औषधीय तेलों से महाप्रभु के श्रीअंग की विशेष मालिश।
🔹 छठवां दिन: शीतल परिमल लेप - ज्वर के प्रभाव को कम करने चंदन व कस्तूरी का शीतल लेप।
🔹 सातवां दिन: गोपनीय शुद्धि - विग्रहों की आंतरिक और अत्यंत गोपनीय शास्त्रीय सफाई।
🔹 आठवां दिन: गोपनीय जड़ी-बूटी सेवन - राजवैद्य द्वारा निर्मित ज्वर नाशक विशेष काढ़े का भोग।
🔹 नौवां दिन: सादा छैना भोग - महाप्रभु के स्वास्थ्य सुधार हेतु अत्यंत हल्का सात्विक आहार।
🔹 दसवां दिन: दशमूल कंद तैयारी - एकादशी के मुख्य भोग हेतु औषधीय लड्डू बनाने की प्रक्रिया।
🔹 ग्यारहवां दिन: दशमूल कंद लाडू भोग - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु औषधीय लड्डू का महाभोग।
🔹 बारहवां दिन: ज्वर मुक्ति (स्वस्थ होना) - कड़े उपचार के बाद महाप्रभु का बुखार पूरी तरह उतरना।
🔹 तेरहवां दिन: बनका लागी विधि - प्राकृतिक रंगों और औषधियों से प्रभु के श्रीअंग का श्रृंगार।
🔹 चौदहवां दिन: नेत्रोत्सव अनुष्ठान - नेत्रों को रंगकर भगवान का अंतिम दिव्य श्रृंगार पूर्ण करना।
🔹 15वां दिन: नवयौवन रूप दर्शन - पूर्ण स्वस्थ होकर महाप्रभु एकांतवास (अनासार) से बाहर आएंगे।
