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डीजल के लिए दर-दर पंप पंप भटक रहा अन्नदाता, सरकारी नीतियों ने बढ़ाई किसानों की मुश्किलें

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 डीजल के लिए दर-दर पंप पंप भटक रहा अन्नदाता, सरकारी नीतियों ने बढ़ाई किसानों की मुश्किलें  


किसानों को वैरल कुप्पी में डीजल देने पर पाबंदी टेक्ट्रर लाने पर डीजल 

अमरवाड़ा/छिंदवाड़ा।उग्र प्रभा 

देश का अन्नदाता आज फिर व्यवस्था की मार झेलने को मजबूर है। सरकारें मंचों से किसानों की आय दोगुनी करने, कृषि को लाभ का धंधा बनाने और किसान हितैषी होने के दावे करती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है। खरीफ सीजन के सबसे महत्वपूर्ण दौर में किसान खेतों में नहीं, बल्कि डीजल की तलाश में पेट्रोल पंपों के चक्कर काट रहा है।

जून माह बोनी का समय है। बारिश की पहली फुहार के साथ किसान दिन-रात खेतों में मेहनत करता है ताकि समय पर बुआई पूरी हो सके। लेकिन अब हालात ऐसे बन गए हैं कि खेतों में चल रहे ट्रैक्टरों को डीजल उपलब्ध कराने के बजाय किसानों को कई-कई किलोमीटर दूर पेट्रोल पंप तक ट्रैक्टर लेकर पहुंचने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

सरकार की नई व्यवस्थाओं और कड़े नियमों के चलते कई पेट्रोल पंप ड्रम, बैरल या कुप्पियों में डीजल देने से इंकार कर रहे हैं। सवाल यह है कि क्या नीति बनाने वालों ने कभी सोचा कि खेतों के बीच खड़े ट्रैक्टर और कृषि यंत्र पेट्रोल पंप तक कैसे पहुंचेंगे? क्या किसान खेती छोड़कर केवल डीजल भराने के लिए दिनभर सड़कें नापता रहे?

एक ओर सरकार किसानों की आय बढ़ाने की बात करती है, दूसरी ओर ऐसी व्यवस्थाएं लागू कर रही है जिससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। किसान ट्रैक्टर लेकर 20 से 30 किलोमीटर दूर पेट्रोल पंप तक जाएगा, रास्ते में डीजल भी जलेगा, समय भी बर्बाद होगा और बोनी का कार्य भी प्रभावित होगा। इसका सीधा नुकसान किसान को ही उठाना पड़ेगा।

विडंबना यह है कि सड़कों पर दौड़ने वाले बड़े वाहन, बसें और मालवाहक ट्रक आसानी से टैंक भरवा रहे हैं, लेकिन खेतों में अन्न उत्पादन करने वाले ट्रैक्टरों के लिए डीजल प्राप्त करना चुनौती बन गया है। यह व्यवस्था किसानों को राहत देने के बजाय उन्हें और अधिक परेशान करने वाली साबित हो रही है।

खाद वितरण व्यवस्था भी किसानों की परेशानी का बड़ा कारण बनी हुई है। ई-टोकन प्रणाली के कारण कई किसानों को अपने क्षेत्र में खाद उपलब्ध नहीं होने पर दूसरे विकासखंडों तक जाना पड़ रहा है। 50 से 70 किलोमीटर दूर जाकर सीमित मात्रा में यूरिया खरीदना पड़ रहा है, जिससे परिवहन खर्च अलग बढ़ रहा है। अब डीजल की नई समस्या ने किसानों की कमर और तोड़ दी है।

किसानों का कहना है कि खेती के समय खाद के लिए भटकना पड़ता है, डीजल के लिए भटकना पड़ता है और फसल तैयार होने पर उचित मूल्य के लिए संघर्ष करना पड़ता है। आखिर किसान कब खेती करेगा और कब सरकारी व्यवस्थाओं के चक्कर लगाएगा?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि अन्नदाता को ही हर मोर्चे पर परेशान किया जाएगा, तो देश की खाद्य सुरक्षा कैसे मजबूत होगी?

सरकार को चाहिए कि किसानों की वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए डीजल एवं कृषि आदानों की उपलब्धता को सरल बनाए। अन्यथा किसान हितैषी होने के दावे केवल भाषणों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएंगे।

इस गंभीर समस्या को लेकर उग्र प्रभा डिजिटल प्रिंट समाचार के प्रधान संपादक एवं सामाजिक कार्यकर्ता नीलेश डेहरिया ने चिंता व्यक्त करते हुए स्थानीय प्रशासन का ध्यान आकृष्ट किया। श्री डेहरिया ने दूरभाष पर अनुविभागीय राजस्व अधिकारी (एसडीएम) अमरवाड़ा एवं जिला मजिस्ट्रेट कलेक्टर छिंदवाड़ा से चर्चा कर किसानों की व्यथा सुनाई तथा त्वरित समाधान की मांग की।

चर्चा के दौरान एसडीएम ने बताया कि ड्रम, बैरल अथवा कुप्पियों में डीजल वितरण से संबंधित आदेश भारत सरकार स्तर से जारी हुए हैं। उन्होंने कहा कि इस मामले में स्थानीय प्रशासन हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं है तथा उनके कार्यालय को भी इस संबंध में कोई पृथक आदेश प्राप्त नहीं हुआ है। यह निर्देश सीधे पेट्रोल पंप संचालकों तक पहुंचे हैं।

वहीं किसानों को तत्काल राहत देने और व्यावहारिक समाधान निकालने के संबंध में जिला स्तर पर भी कोई स्पष्ट पहल या ठोस आश्वासन सामने नहीं आया। इससे किसानों में निराशा और चिंता का माहौल है।

इसी विषय को लेकर छिंदवाड़ा में डीजल आपूर्ति से जुड़े एक तेल कंपनी के सेल्स प्रतिनिधि से भी चर्चा की गई। किसानों की परेशानी और पेट्रोल पंपों पर ड्रम, बैरल एवं कुप्पियों में डीजल नहीं दिए जाने की शिकायत पर उन्होंने भारत सरकार द्वारा जारी गजट अधिसूचना का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि पेट्रोल पंप संचालक और तेल कंपनियां शासन के निर्देशों का उल्लंघन नहीं कर सकतीं।

सेल्स प्रतिनिधि ने कहा कि जितनी अधिक मात्रा में डीजल की बिक्री होगी, कंपनी और डीलर दोनों को उतना ही अधिक लाभ होगा। इसके बावजूद वर्तमान नियमों के कारण किसानों को पूर्व की भांति कंटेनरों में डीजल उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। उन्होंने कहा कि यह निर्णय स्थानीय स्तर का नहीं बल्कि केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुरूप लागू किया जा रहा है, इसलिए नियमों का पालन करना उनकी मजबूरी है।

इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल पेट्रोल पंप संचालकों या तेल कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी नीतियों और व्यवस्थाओं की है जिनका सीधा प्रभाव खेत-खलिहान में मेहनत कर रहे किसानों पर पड़ रहा है। किसान संगठनों और ग्रामीणों का कहना है कि यदि सरकार किसानों की वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक समाधान नहीं निकालेगी तो खरीफ सीजन में कृषि कार्य प्रभावित हो सकते हैं और इसका असर उत्पादन पर भी पड़ सकता है।

"जिस किसान के हाथों से देश का पेट भरता है, वही किसान आज डीजल, खाद और उचित मूल्य के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है। यह केवल किसान की नहीं, बल्कि कृषि व्यवस्था की विफलता का प्रतीक है।"

"खेत में खड़ा ट्रैक्टर डीजल मांग रहा है, किसान समाधान मांग रहा है, तेल कंपनी नियमों की मजबूरी बता रही है, प्रशासन हाथ खड़े कर रहा है और सरकार मौन है। आखिर अन्नदाता की पुकार कौन सुनेगा?"

नीलेश डेहरिया

प्रधान संपादक, उग्र प्रभा डिजिटल प्रिंट समाचार

सामाजिक कार्यकर्ता

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