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दल बदलुओं ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था तहस नहस कर दी :एस.आर.शेंडे

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 दल बदलुओं ने प्रजातांत्रिक व्यवस्था तहस नहस कर दी :एस.आर.शेंडे 


दलबदल करना जनादेश के साथ घोर विश्वासघात

मतदाताओं को धोखा देकर करोडों में बिकने वाले कभी ईमानदार नहीं हो सकते

आम नागरिकों का सजग व चिंतनशील होना जरूरी

सौंसर //उग्र प्रभा 

सिविल राइट्स प्रोटक्शन सेल मध्यप्रदेश के अध्यक्ष,महामहिम राष्ट्रपति एवं विविध संस्थाओं से पुरस्कृत साहित्यकार एस.आर.शेंडे ने बताया कि,सरकार में स्थिरता लाने,विधायकों सांसदों द्वारा लालच या व्यक्तिगत कारणों से पार्टी बदलने पर रोक लगाने के लिए संसद ने 52 वें संशोधन के माध्यम से 10 वी अनुसूचित से जोडकर 18 मार्च 1985 को दलबदल कानून लागू किया। तब स्व.राजीव गांधी जी प्रधान मंत्री थे।यदि किसी पार्टी के दो तिहाई सदस्य अन्य पार्टी में विलीन हो जाते हैं या अलग गुट बनाते हैं,तो उनपर कानून लागू नहीं होता।

    श्री शेंडे ने खेद व्यक्त किया कि,कानून के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल कर चुने हुए प्रतिनिधि धडल्ले से अपने मतदाताओं से विश्वास घात कर पद प्रतिष्ठा दौलत के लालच और पिछले पाप कर्मों को छुपाने के लिए दलबदल कर रहे हैं,चुनी हुई सरकारों को ध्वस्त कर रहे हैं। दरअसल दलबदलुओं की कोई विचारधारा,जवाबदेही नहीं होती। जिधर ज्यादा बोली लगी,उधर करोड़ो में बिकते है। चुनकर देनेवाला मतदाता अपना माथा पीटता है। बिकने वाला,सत्ता  की वाशिंग मशीन में धुलने वाला प्रतिनिधि कभी ईमानदार नहीं हो सकता। दलबदलू पहले इस्तीफा दे फिर दलबदल करे। शासकीय दस्तावेजों के अनुसार कई नुमाइंदे दागी है,उनपर अनाचार के गंभीर केस है। सवाल उठता है ऐसे बेईमान प्रतिनिधि देश व जनता का क्या खाक उद्धार करेंगे। वें तो साथ पीढ़ियों की कमाई में व्यस्त हैं युवा,किसान,मजदूर,आम आदमी बेरोजगारी,कर्ज,भूख,महंगाई,भ्रष्टाचार से हलाकान है। वर्तमान सरकारें जाति मजहब की अवधारणा पर आश्रित चोर चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर दलबदलूओ से मिलकर चल रही है। दुर्भाग्य है कि,हमारे यहाँ समर्थक और विचारशील व्यक्ति के बीच अंतर मिटता जा रहा है। विचारशील प्रश्न पूछता है,गलती पर टोकता है,उसके लिए समाज व देश सर्वोपरि है। जबकि समर्थक बहाने ढूंढता है,गलती को उपलब्धि समझता है,उसके लिए पार्टी व नेता सर्वोपरि हैं,अपने नेता को भगवान समझता है। उसके कुप्रभाव में अंधा होकर खुद के साथ परिवार,समाज व देश को बर्बाद करने का भागीदार बनता हैं। नायक कब खलनायक बनता है अँधे समर्थक को पता ही नहीं चलता। इसलिए सजग व चिंतनशील होना जरूरी है।

अंत में-

कौशल भी बिकता है,कारकून भी बिकता है,

हमदम भी बिकता है,हारून भी बिकता है,

अगर दाम मनमाफ़िक मिले तो,

काजी भी बिकता है,कानून भी बिकता है।

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