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शासकीय महाविद्यालय चांद में वर्षा जल संचयन पर कार्यशाला

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      मोहिता जगदेव

 उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

 जल संरक्षण बिना हम सभ्यता को कायम नहीं रख सकते हैं": प्रो. अमर सिंह 

जल ब्रह्मांड में सभी जीवों के जीवित रहने का आधार है": प्रो. अमर सिंह 

जल जगत में जीवित रहने का प्रमुख रिसोर्स है": प्रो. अमर सिंह 

उग्र प्रभा समाचार,चांद छिंदवाड़ा: शासकीय महाविद्यालय में में सतत जीवन शैली से पर्यावरण संरक्षण के अंतर्गत वर्षा जल संचयन पर आयोजित कार्यशाला में प्रमुख वक्ता प्राचार्य प्रो. अमर सिंह ने कहा कि जल जगत में जीवित रहने का प्रमुख आधार है। जल संरक्षण बिना हम सभ्यता को कायम नहीं रख सकते हैं। वर्षा के जल संचयन करके भूजल को रिचार्ज किया जा सकता है, जिसका उपयोग सिंचाई व घरेलू कार्य के लिए किया जा सकता है। वर्षा के जल का उपयोग छत या अहाते से पाइप द्वारा एकत्रित करके कृत्रिम रिचार्ज के लिए किया जा सकता है। अतिरिक्त पानी को रिचार्ज गड्ढों से सीधे जमीन में भेजकर भूजल में वृद्धि करके सूखे का सामना किया जा सकता है और बिजली के बिल में बचत की जा सकती है। जल संचयन के बिना हम सभ्यता को कायम नहीं रख सकते हैं। प्रो. रजनी कवरेती ने कहा कि ब्रश करते वक्त नल बंद करके, लीक नल को ठीक करके और शॉवर की बजाय बाल्टी का प्रयोग करके पानी की बचत की जा सकती है। प्रो. जी. एल. विश्वकर्मा ने कहा कि फल सब्जी के धोए पानी का पौधों में प्रयोग, वाशिंग मशीन का पूर्ण प्रयोग और पाइप की जगह बाल्टी के पानी से गाड़ी धोकर पानी की बचत की जा सकती है। प्रो. आर. के. पहाड़े ने कहा कि ड्रिप सिंचाई करके, पौधों की जड़ों के पास पत्तियां रखकर व आरओ के बेकार पानी का उपयोग करके जागरूकता बढ़ाकर पानी की बचत की जा सकती है। प्रो. लक्ष्मण उइके ने कहा कि जल के पुनर्चक्रण, कम प्रवाह वाले फिक्सचर का प्रयोग करके और सफाई के लिए पाइप के पानी की जगह झाड़ू का प्रयोग करके पानी की बचत की जा सकती है। प्रो. सुरेखा तेलकर ने कहा कि जल है तो जीवन है, अन्यथा जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। प्रो. सकर लाल बट्टी ने कहा कि जीवन की उत्पत्ति जल से हुई है, अगर शुद्ध जल नहीं होगा तो सृष्टि में जीवों का बचना संभव नहीं होगा। प्रो. रक्षा उपश्याम ने कहा कि जल संचयन की जितनी भी तकनीकें संभव हों, अपनानी चाहिए, अन्यथा हमारी लापरवाही का खामियाजा हमें ही भुगतना पड़ेगा, किसी और को नहीं। संतोष अमोडिया ने कहा कि जल के सदुपयोग की बातें हमारी सनातन संस्कृति व धार्मिक पुस्तकों में बखूबी कही गई हैं।

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