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नदी की धार सी संवेदनायें" गीत/नवगीत संग्रह साहित्य, कला और संगीत की त्रिवेणी से है लबरेज

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          मोहिता जगदेव

    उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा 

 "नदी की धार सी संवेदनायें" गीत/नवगीत संग्रह साहित्य, कला और संगीत की त्रिवेणी से है लबरेज

      कवि - श्री रोहित रूसिया                       

     समीक्षा आलेख - ओमप्रकाश "नयन", छिंदवाड़ा


       युवा कवि श्री रोहित रूसिया एक संभावनाशील रचनाकार है तथा उनके अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद से वर्ष 2014 में प्रकाशित गीत/नवगीत संग्रह "नदी की धार सी संवेदनायें" में साहित्य, कला, और संगीत की त्रिवेणी है । रोहित बहुमुखी प्रतिभा के धनी कवि है तथा उन्होंने जिस क्षेत्र में भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया है, अपनी श्रेष्ठता का ही परिचय दिया है । यह संग्रह भी उनकी श्रेष्ठता का परिचायक है।

"नदी की धार सी संवेदनायें" संग्रह में रोहित रूसिया के 50 गीत/नवगीत संग्रहित है। संग्रह के कुछ गीतों का जब गोष्ठियों में गायन सुना तो इनकी लय-ताल ने मंत्रमुग्ध कर दिया, किन्तु जब इन गीतों को एक साथ पढने का मौका मिला तो मुझे सुखद अनुभूतियों से गुजरना पड़ा। एक रचनाकार में कई संभावनाओं को देखकर मुझे चमत्कृत और अभिभूत होना पड़ा। एक चित्रकार के रूप में रोहित से मेरी पहली मुलाकात म.प्र.प्रगतिशील लेखक संघ की जिला इकाई के सचिव रहते हुये प्रसिध्द शायर फिराक गोरखपुरी पर केन्द्रित विचार गोष्ठी, संगीतिक प्रस्तुति और चित्रकला प्रदर्शनी के आयोजन के दौरान हुई, जब इस कार्यक्रम में संस्था के अध्यक्ष श्री प्रदीप श्रीवास्तव के सौजन्य से फिराक गोरखपुरी की रचनाओं पर केन्द्रित रोहित की चित्र प्रदर्शनी के प्रदर्शन को देखने का मौका मिला। इस चित्र प्रदर्शनी की सभी ने भूरि-भूरि सराहना की और रोहित की चित्रकला का जादू सभी ने महसूस किया। बीच-बीच में रोहित की संगीतिक प्रस्तुतियों को भी सुनने का मौका मिला और आयुर्वेद के क्षेत्र में भी नये आविष्कारों और प्रयोगों की भी जानकारी मिली। आयुर्वेद के क्षेत्र में पाचन के लिये उपयोगी उत्पाद कल्याण चूर्ण की ख्याति भी सुनने को मिली । बुटिक के क्षेत्र में भी वे अपनी सहधर्मिनी के साथ छीपाकला के नये प्रयोग कर रहे हैं। इस सारी गतिविधियों के दौरान रंगकर्म के क्षेत्र में भी उनकी रूचि में नये आयामों को छेड़ा है। मैने रोहित को एक सहज, सरल और प्रतिभा से लबरेज रचनाकार और कलाकार के रूप में पाया।

       संग्रह के गीतों में रोहित ने अपनी चित्रकला और विचारों का सुंदर समन्वय के साथ बेहतरीन बिम्बात्मक प्रस्तुतिकरण किया है। वे जिस मासूमियत और भोलेपन से अपने गीत प्रस्तुत करते हैं, उसमें उनका कथ्य कल्पनाशीलता और वैचारिकता की गहराईयों से छूता नजर आता है। उनकी चिंताओं में जहां प्रकृति, पर्यावरण, जीव-जंतु और मानवीय परिवेश है, वहीं देश व समाज की संवेदनायें भी मौजूद है। वे अपने बचपन को बार-बार अतीत और स्मृतियों के स्वर्णयुग में ले जाते है और वर्तमान से तादातम्य स्थापित करते हुये भविष्य की मजबूत सीढियों का निर्माण करते है जिसमें व्यक्ति और समाज सुंदर और सुदृढ़ बन सके । उनकी रचनाओं में जहां देश प्रेम और धरती के प्रति रागात्मकता है, वहीं मानवीय जीवन की उलझनों, रिश्ते-नातों, स्मृतियों, आशाओं-आकांक्षाओं, विसंगतियों, जिजीविषाओं और निजी विचारों और संवेदनाओं के शब्दचित्र उनकी प्रतिभा का परिचय देते हैं । दर्शन और अध्यात्म के माध्यम से जीवन की निस्सारता की धारा भी संग्रह में प्रवाहित है ।

युवा कवि रोहित अपने नवगीतों/गीतों में दो या तीन पदबंधों में बहुत ही शब्दों में सारगर्भित रचना रचते हैं । एक चित्रकार अपनी तूलिका से जिस तरह चित्र बनाता है, उसी तरह इन छोटे-छोटे पदबंधों में शब्द चित्रों की सर्जना हुई है । वे लिखते है- "दिखाने के बचे, सब रिश्ते-नाते, जुबां पर हों, 

भले ही मीठी बातें, यूं संबंधों में तो, खाई बहुत है।" तो मानवीय रिश्तों का कडवा सच एकदम सामने आ जाता है या "मुट्ठियों से, रेत जैसी, झर रही है जिंदगी" तो जीवन का सच बहुत ही कम शब्दों में अपनी दार्शनिकता के साथ अठखेलियां करता है । इसी प्रकार "सूखती आंखों की पलकें, ढूंढती हैं, एक तिनके का सहारा" तो निराशा के बियाबान मरूस्थल में आशा के सूरज की तलाश का बिम्ब जीवन की जिजीविषा का बोध करा देता है । "नदी की धार सी संवेदनायें" गीत में जहां घटती संवेदनाओं की चिंता व्याप्त है, वहीं वर्तमान परिवेश के रक्तरंजित वातावरण और जहरीली हवाओं में व्यक्ति के जीवन की अनिश्चितता का स्वर भी है, किंतु "जीतेंगे हम" गीत में जीवन में अच्छे दौर के आने की आशा में बेचैन रातों और चुभती बातों से निजात मिलने की अभिलाषा भी संचित है। 

       रोहित अपने गीतों में जहां वर्तमान परिवेश के सामने लाते हैं, वहीं संघर्षों से जूझते हुये अपनी राह पर निरंतर चलते रहने का आव्हान भी करते हैं। परिस्थतियों से घबराकर या हारकर तन्हा बैठने से बेहतर वे धैर्य और संयम रखते हुये पेड़ों की शाखों पर नई कोंपल, पत्ते और बौर आने का इंतजार करने की सलाह देते हैं । यही नहीं वे अपने गम, थकान, खुशी आदि के मौकों पर या जब भी कुछ लिखना हों तो नया लिखने का पैगाम देते हैं। गम की चिरैया, कितने उलझ गये हैं, मेरी आंखों में, गौरैया, प्रीत भरे अनुबंध, एक पंछी ढूंढता है, सुविधा के मोह में, दीप जले पर मन सूना, एक अकेला मेरा मन जैसे कई गीत/नवगीत अपनी कोमलता, सौंदर्य, लालित्य से जहां मंत्रमुग्ध करते हैं, वहीं मन की विभिन्न स्थितियों और भावों का दिग्दर्शन कराते हैं। 

       रोहित के गीतों की भाषा सहज, सरल और बोधगम्य है, किन्तु कहीं-कहीं छंदों के संधान में लापरवाही सी नजर आती है। मुखपृष्ठ के साथ ही अन्य पृष्ठों का रेखांकन रोहित की प्रतिभा से चमत्कृत करता है। एक अच्छे संग्रह की सौगात के साथ ही आगामी समय में भी हमें रोहित से ऐसी ही मधुर और लालित्यपूर्ण रचनाओं की अपेक्षा है। मैं कामना करता हूं कि पर्वतों में, नदियों में, झरनों में, सुबह और शामों की किरणों में उनके शब्द मीत बनकर घूमते रहें और उनके शब्द गीत बनकर गूंजते रहें                                  

   (ओमप्रकाश 'नयन')

   934, तारा कॉलोनी, बरारीपुरा, 

       छिंदवाड़ा, म.प्र.

         पिन-480001

      मोबाईल नंबर-7828774942

कृति : नदी की धार सी संवेदनायें

कृतिकार : रोहित रूसिया

प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद

प्रकाशन वर्ष : 2014, 

मूल्य : 120 रूपये, पृष्ठ : 112

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