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भाव उमडते जब ,मन वाल्मीकि हो जाता है ।अनुभूति की निधि लेकर रामायण रच जाता है: ओमप्रकाश नयन

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        मोहिता जगदेव

   उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

म. प्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद की पावस गोष्ठी आयोजित 

"कविता की करुणा का कैपसूल मन को रोगी नहीं होने देता है": अवधेश तिवारी 

"कविता अनंत शाश्वत ब्राह्मी सर्जना का स्वर्गीय अहसास है": प्रो. अमर सिंह 

 "तुम उस पर मत होना फिदा, शिलांग जाकर होना पड़े जुदा: लक्ष्मण प्रसाद डेहरिया

जीवन में इतनी कड़वाहट क्यों है, हर पल में घबराहट क्यों है: कवि अशोक जैन

उग्र प्रभा समाचार, छिंदवाड़ा: म. प्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद की जवाहर कन्या उ. मा. शाला सब्जी मंडी छिंदवाड़ा में आयोजित पावस गोष्ठी में मुख्य अतिथि बतौर वरिष्ठ कवि रतनाकर रतन ने सत्यं शिवम् सुंदरम के संदेश में कहा कि भारत राष्ट्र में राम एक मर्यादित आचरण के मानक अनुयायी चरित्र हैं, सीता स्वयं में एक समूची शाश्वत सनातन संस्कृति है। परिषद के अध्यक्ष अवधेश तिवारी ने कहा कि कविता करुणा के कैपसूल से कलुषित मन को विशुद्ध करके मनुष्य के समूची दैहिक अस्तित्व को बीमार नहीं होने देती है। गोष्ठी अध्यक्ष प्रो. अमर सिंह ने कविता को अनंत शाश्वत ब्राह्मी सर्जनात्मक ऊर्जा का स्वर्गीय अहसास कहा। वरिष्ठ कवि ओमप्रकाश नयन ने "भाव उमड़ते जब ,मन बाल्मीकि हो जाता है ।अनुभूति की निधि लेकर रामायण रच जाता है"। वरिष्ठ कवि अशोक जैन ने "जीवन में इतनी कड़वाहट क्यों है, हर पल में घबराहट क्यों है" कहकर मनुष्य द्वारा अनावश्यक को ओढ़कर खुद ही दुःखी होने पर प्रहार किया। श्रीमती दीपशिखा सागर ने "रफ्ता रफ्ता सन्नाटों की आंख मिचौनी जाएगी, तन्हाई की बांह मरोड़ी जाएगी" रचना पढ़कर लाइलाज बीमारों के इलाज की तरकीब ढूंढ निकाली है। परिषद सचिव रामलाल सराठे ने मंच संचालन करते हुए "अक्षरों के दिए जलाकर जग आलोकित करने व आरे मेघा, काले मेघा घनन घनन बरसाए मेघा", और हैदर अली ने"आज बरसते बादल ने छेड़ा है मुझको " के केंद्रीय भाव से पावस ऋतु पर अपनी अद्भुत रचना पढ़ी।

श्रीमती प्रीति जैन शक्रवार ने " जब प्रेम की चाहत हुई तो गजल बन गई", श्रीमती अनुराधा तिवारी ने अपनी बाल कविता "नवयुग के तुम्हीं भविष्य हो, भारत भाग्य विधाता", श्रीमती मोहिता मुकेश कमलेंदु ने" लहलहाती रहूँ, मैं फसलों सी, हवा के झोंके पर, फिर भी दबी रहूँ, मैं बीज सी, सदा ही जमीं के भीतर", श्रीमती मंजु देशमुख ने "कारवां बढ़ रहा है लेखनी का "शीर्षक से बहुत ही सारगर्भित काव्य रचनाएं पढ़ी।

 वरिष्ठ कवि लक्ष्मण प्रसाद डहेरिया ने "तुम उस पर मत होना फिदा, शिलांग जाकर होना पड़े जुदा", इंदर  सिंह ठाकुर ने "फूल शहीदों को ठंडक देने हैं", राजेंद्र यादव ने "हजम होती नहीं क्यों न कोई बात सच की", और श्रीमती अंबिका प्रदीप ने लहर लहर जटाओं में किलोल गंग कर रही" से अपनी बेजोड़ काव्य रचना का परिचय दिया।

श्रीमती सविता श्रीवास्तव ने "पिंजरा में बोले टुइयां, राम राम गुइयां", श्रीमती गीतांजलि मिश्रा गीत ने "ए आई के डेरा डालने से उपजे गाला", मनीष जैन तारन ने "उम्र रूपी घड़ा रीता जा रहा है", और स्वप्निल जैन ने "पेड़ पेड़ नहीं जन्नत है परिंदों की" शीर्षक से अपनी बेहतरीन काव्य रचनाएं पढ़ी। कवि संजय सोनी ने गीता भाष्य को गीत में बदलने की अद्भुत काव्य कौशल एवं अंकुर बाल्मीकि ने आदमी होने की विसंगति पर अपनी व्यंग्यात्मक रचना पढ़कर खूब तालियां बटोरी।

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