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टेमनीकला की प्रोफेसर बेटी का व्याख्यान जर्मनी में

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         मोहिता जगदेव

    उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

टेमनीकला की प्रोफेसर बेटी का व्याख्यान जर्मनी में 

" प्रो. पटवारी का भारिया जनजाति की उपचार पद्धति पर जर्मनी में व्याख्यान प्राध्यापक बिरादरी के लिए उत्कृष्टता हासिल करने की मिसाल है": प्रो वाय. के. शर्मा प्राचार्य 

" प्रो. पटवारी की शोध विशेषज्ञता ने उनको राष्ट्र की सीमाओं के पार के प्राध्यापक के बराबर लाकर खड़ा कर दिया है": प्रो. लक्ष्मीचंद 

" प्रो. पटवारी की लोक संस्कृति की विषय विशेषज्ञता एक प्राध्यापक की विकास की अंतिम संभावनाओं का एक जीवंत उदाहरण है "": प्रो. अमर सिंह 

" प्रो. पटवारी ने लोक संस्कृति की लुप्त 6सांस्कृतिक धरोहर को सार्वजनिक प्लेटफार्म पर लाने का अद्भुत काम किया है": प्रो. धर्मेंद्र पारे निदेशक जनजाति लोककला बोली विकास विभाग भोपाल 

उग्र प्रभा समाचार ,छिंदवाड़ा: कहते हैं कि गुणवत्ता किसी सिफारिश की मोहताज नहीं होती है। जब हमारी कार्यसिद्धि की ऊंचाई हिमायल से भी अधिक होती है तो उसको दुनिया सेल्यूट करती है और जब विषय विशेषज्ञता बेशुमार होती है तो व्यक्ति को राष्ट्र की सीमाओं को लांघ जाता है। ऐसा ही कर दिखाया है छिंदवाड़ा के पिछड़े इलाके सांवरी बाजार के पास टेमनीकला गांव में जन्मी मुरारीलाल पवार व श्रीमती विमला पवार की बेटी आज हिन्दी की मशहूर हस्ती बनी  प्रो. टीकमणि पटवारी ने। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस छिंदवाड़ा की हिन्दी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. टीकमणि पटवारी जर्मनी की हेडेलबर्ग यूनिवर्सिटी के दक्षिण एशियन संस्थान में "पहाड़ियों पर उपचार: भारतीय जनजातीय संस्कृति और उनकी उपचार पद्धतियां" शीर्षक से विश्व चिकित्सा नृविज्ञान के बैनर तले अपने शोध पत्र पर पातालकोट घाटी में भारिया जनजाति की उपचार पद्धति पर केंद्रित शोध पत्र पर व्याख्यान देंगी। उपचार एक समग्र प्रक्रिया है जो पारिस्थितिक सद्भाव, रिवाज और सन्निहित ज्ञान से जुड़ी रहती है। बीमारी की उत्पत्ति की प्रमुख वजह मानव के भावनात्मक गठन, वंश डीएनए और प्रकृति के बीच असंतुलन है। प्रो. पटवारी का वंशविज्ञान आधारित आख्यान इनके अन्तःसंबंधों और व्यक्ति के स्वस्थ होने की सांस्कृतिक समझ पर केंद्रित है।


पुरस्कार प्राप्त लेखिका प्रो. पटवारी को मध्य प्रदेश उच्च शिक्षा विभाग में अपनी साहित्यिक और जनजातीय लोकपद्धति आधारित विशिष्ट शोध के योगदान के लिए जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि प्रो. पटवारी के इस विश्व स्तर पर चयनित हुए शोध पत्र की वो विभिन्न स्तरों पर छंटनी हुई है। प्रो. पटवारी की इस यशोमय उपलब्धि पर उनके पति नीलकंठ पटवारी एसडीओ कृषि छिंदवाड़ा, प्रो. धर्मेंद्र पारे, निदेशक जनजाति लोककला बोली विकास अकादमी भोपाल, पी. जी. कॉलेज प्राचार्य डॉ वाय. के. शर्मा, हिन्दी के विभागाध्यक्ष प्रो लक्ष्मीचंद एवं प्रो. राजेंद्र कुमार मिश्रा एवं प्रो. अमर सिंह के साथ समस्त परिजनों ने शुभकामनाएं प्रेषित की हैं।

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