मोहिता जगदेव
उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा
प्रो. लक्ष्मीचंद लफ्जों को सलीके से परोसने माहिर हैं": प्रो. अमर सिंह
अंतर्निहित दिव्यता का वाह्य प्रकटीकरण ही सृजन है": प्रो. लक्ष्मीचंद
भाषा शाश्वत मानव मूल्यों को गहरा करती है": प्रो. सुदीश सूर्यवंशी
उग्र प्रभा समाचार,चांद छिंदवाड़ा: शासकीय महाविद्यालय चांद में राष्ट्रीय सेवा योजना विभाग द्वारा पी.जी. कॉलेज छिंदवाड़ा के प्राचार्य, राजा शंकरशाह विश्वविद्यालय के कला संकाय के अधिष्ठाता और भोज विश्वविद्यालय के क्षेत्रीय निदेशक प्रो. लक्ष्मीचंद के व्यक्तित्व व कृतित्व विषय पर आयोजित व्याख्यान में प्राचार्य प्रो. अमर सिंह ने कहा कि प्रो.लक्ष्मीचंद हिन्दी भाषा के लफ्जों को सलीके से परोसने की एक सिद्धहस्त शख्सियत हैं, जिसका फायदा उनके शिष्यों को बखूबी मिला है। भाषिक लापरवाही का खामियाजा पूरी कौम भुगतती है। भाषाई व्यवहार में अमर्यादित आचरण व्यक्ति को निर्वस्त्र कर देता है। प्रो. सुदीश सूर्यवंशी ने कहा कि प्रो. लक्ष्मीचंद ने हमेशा कहा है कि भाषा राष्ट्र के शाश्वत मानव मूल्यों को गहराकर स्वयं को विस्तारित करती है। हिन्दी भाषा ने भारत की सांस्कृतिक तहज़ीब की विरासत को सहेजकर मनुष्यता को पोषित करने का दुर्लभ कार्य किया है। चांद नगर परिषद अध्यक्ष दान सिंह ठाकुर ने कहा कि प्रो. लक्ष्मीचंद के वक्तव्यों से यह उद्घाटित होता है कि शब्दों की ऊर्जा, दीप्ति व द्युति व्यक्ति को गतिशील बनाती है, जिससे मानवीय संवेदनाएं प्रबल होती हैं। भावप्रसूत सृजनता ही मानव सभ्यता की दिव्य भव्यता है, जिससे स्वस्थ परंपराओं के क्षय को रोकना संभव होता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता बिजेंद्र सिंह ने कहा कि प्रो. लक्ष्मीचंद का मत है कि भाषिक चेतन्यता मानव को भय, संदेह व न्यून आकलन की कमजोरियों से मुक्त कर धार धरने का काम करती है। प्रो. आर. के. पहाड़े ने प्रो लक्ष्मीचंद के कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उन्होंने एक छात्र के रूप में उनसे सीखा है कि भाषा का पारदर्शी प्रामाणिक प्रयोग मनुष्य की तमाम अंतर्द्वंदों से उत्पन्न अड़चनों की अचूक दवा है। भाषा का अंतिम केंद्रीय लक्ष्य व्यक्ति को तेजस्वी तपस्वी व ओजस्वी बनाना है।
प्रो. सुरेखा तेलकर ने कहा कि प्रो. लक्ष्मीचंद ने उन्हें सिखाया है कि भाषा साहित्य का अध्येता-समीक्षक अपनी कठोर समालोचनात्मक भाव एवं कोमल संवेदनात्मक भावुक दृष्टि के संतुलित योग से सृष्टि में नवसृजन के कारक बनता है। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रो. लक्ष्मीचंद ने चांद कालेज के आयोजकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि दिव्य सृजनधर्मिता टूटे हुए लोगों को जोड़ती है। हर सृजनधर्मी को अपनी अंतर्निहित दिव्यता को वाह्य जगत में अपने अपने हिस्से की खाक को कम से कम करने के लिए इस जगत में भेजा गया है। सृजन- सुख वह दौलत है, जिसके सामने समूचे ब्रह्मांड के सुख फीके पड़ जाते हैं। आखिर हर नर आया ही है इस जहां में नारायण बनकर लौटने के लिए और हर नारी नारायणी बनकर अपनी श्रद्धा से इस जहान को आप्लावित करने की खातिर।

