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अपनी भाषा को खोना खुद के वजूद को खो देना है ": अवधेश तिवारी

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      मोहिता जगदेव

उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

हिन्दी भाषा को समर्पित काव्य गोष्ठी आयोजित 

"हिन्दी की समृद्धि समावेशी लोक के द्वंद्वों के समाधान में है":  प्रो. अमर सिंह 

अंग्रेजी से नहीं गुरेज़,थोप गए जिनको अंग्रेज- राजेंद्र चौबे

-मेरा वज़ूद तुझमें महका है- अनु कामोने 

उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा: म. प्र. आंचलिक साहित्यकार परिषद छिंदवाड़ा की हिन्दी भाषा को समर्पित संकट मोचन हनुमान मंदिर नरसिंहपुर रोड छिंदवाड़ा में आयोजित काव्य गोष्ठी में वरिष्ठ कवि रतनाकर रतन ने कविता को क्रांतिकारी संवेदनाओं से अभूतपूर्व बदलाव का एक जरिया बताया। पूर्व आकाशवाणी उद्घोषक अवधेश तिवारी ने हिन्दी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अपनी भाषा को खोना खुद के वजूद को खोकर पहचान के संकट को निमंत्रण देने जैसा है। प्रो. अमर सिंह ने हिन्दी भाषा की भावी समृद्धि को सर्वहारा वर्ग के द्वंद्वों के वैचारिक समाधान में निहित बताया। वरिष्ठ कवि राजेंद्र चौबे ने "मुंह लगे कौन हवाओं के इसलिए, ओट में जलता है मिट्टी का दीया", कहकर  काव्य अभिव्यक्ति का अनूठा उदाहरण पेश किया। सौंसर से पधारी कवयित्री श्रीमती अनु कामोने ने "अपनी आँखों से अश्क बहाया न करो, मैं आ नहीं सकता, अपने को सताया न करो", ग़ज़ल पढ़कर हिन्दी भाषा को नमन किया। वरिष्ठ समीक्षक अशोक जैन ने "सांसें चलने तक जीना है, सच है तेरा, मेरा भी है, सांझ ढले पंछी उड़ जाना, अंतिम यही कहानी बाबा", कविता से आध्यात्मिक होने पर बल दिया। श्रीमती ज्योति गुप्ता ने "तुमने हमको कांटे सौंपे, हमने तुमको गुल सौंपा था, तुमने दरिया मोड़ दिए थे, हमने फिर से पुल सौंपा था", काव्य पंक्तियों से विषम हालातों में भी फर्ज निर्वहन को रेखांकित किया। उम्दा कवि ओमप्रकाश नयन ने अपनी रचना "अलसाई पलकों पर, वीणा का पहरा देता हूं, अनुभूति के उद्गारों से वाल्मीकि रामायण रच जाता है", रचना सौंदर्य का अनूठा नमूना प्रस्तुत किया।


श्रीमती मोहिता मुकेश कमलेंदु ने अपनी कविता"विचार हैं गहने मेरे, उमंग है मेरा श्रृंगार, बोली है झुमकी मेरी, बिंदी में है भाषा हिंदी", पढ़कर हिन्दी के प्रति अंतर्निहित प्रेम को उजागर किया। युवा कवयित्री हिना खान ने अपनी काव्य रचना "बेखौफ जिंदगी की परेशानियों से था, एक सिक्के में सारी खुशियां थी, क्या हुआ हजारा बचपन गरीब था", से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। नन्हे मुन्नों के वात्सल्य-भरे कवि प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने "पूजा के कमरे में घंटी की टुन टुन, दादा दादी का कंचन सा मन, उनसे जाकर दुआएं पाओ, अरे भाई थोड़ा हँसो, मुस्कराओ", ध्वनि अलंकार की एक अद्भुत बानगी प्रस्तुत की। सविता श्रीवास्तव ने "रिम झिम फुहारों का, झिलमिल सितारों का अद्भुत संसार", नंद कुमार दीक्षित ने "हमने खाई है कसम, एक दीया जलाने की" और रामलाल सराठे ने अपनी रचना "जय हिंद लिखो, जय गान लिखो, युग जननी का यश गान लिखो, अभिमान करें सब जनम जनम, कवि ऐसा हिंदुस्तान लिखो", पढ़कर सभी श्रोताओं में देशभक्ति का रस उड़ेल दिया। राजेंद्र यादव ने अपनी कविता यों पढ़ी: "होती आई, ज़िन्दगी में, भूल देखें, फिर किताबों में दबे, वो फूल देखें।, पुष्प हमने भी बिछाए, अक्सर उनकी राह में,पाँव में मेरे चुभोने, जिनके कर में, शूल देखे"। वरिष्ठ कवि नेमीचंद व्योम ने अपनी संस्कृत भाषा में और हैदर अली ने विरह की अभिव्यक्ति से सराबोर अपनी कविता पढ़ी। प्रिंस शर्मा ने अपनी कविता पढ़ते हुए कहा- 'चक्र सुदर्शन के सामने कृष्णा मेरी बंसी भूल गए', तथा अंकुर वाल्मीकि ने प्रश्न किया- लेकर संजीवनी बूटी कब आएंगे हनुमान ?' निर्मला उसरेठे ने इस अवसर पर एक सुंदर भजन प्रस्तुत किया। हिंदी मास में आयोजित यह गोष्टी बड़ी सरस, ज्ञानवर्धक थे तथा विद्वतजनों के व्याख्यान से परिपूर्ण थी । इसमें हिंदी, संस्कृत, उर्दू ,बुंदेली आदि भाषाओं की रचना प्रस्तुत की गई तथा मातृभाषा के महत्व और उसके प्रचार-प्रसार पर चर्चा हुई ।गोष्ठी का संचालन हिना खान ने अपने अनूठे अंदाज में किया।

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