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पंचायतों पर बढ़ता 'ठेकेदार राज'! राजनीतिक दबाव में छीने जा रहे सरपंचों के अधिकार?

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 पंचायतों पर बढ़ता 'ठेकेदार राज'! राजनीतिक दबाव में छीने जा रहे सरपंचों के अधिकार  


15वें वित्त आयोग के निर्माण कार्यों में कथित कमीशनखोरी का खेल, पंचायतें बनीं नाम मात्र की एजेंसी

अमरवाड़ा (छिन्दवाड़ा) डिजिटल उग्र प्रभा 

पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य ग्राम पंचायतों को विकास कार्यों में आत्मनिर्भर और जवाबदेह बनाना है, लेकिन अमरवाड़ा जनपद पंचायत क्षेत्र में हालात इसके विपरीत दिखाई दे रहे हैं। क्षेत्र में चर्चा है कि पंचायतों के निर्माण कार्यों में राजनीतिक दबाव और ठेकेदारी व्यवस्था हावी होती जा रही है।जानकारी के अनुसार, 15वें वित्त आयोग की राशि से स्वीकृत सड़क, सीसी रोड और अन्य निर्माण कार्यों में कई पंचायतों के सरपंचों पर कथित रूप से दबाव बनाया जा रहा है कि वे निर्माण कार्य स्वयं न कराकर बाहरी लोगों के माध्यम से कराएं। पंचायतों से प्रस्ताव पारित कराकर तकनीकी स्वीकृति (टीएस) प्राप्त की जाती है, जिसके बाद निर्माण कार्यों का संचालन पंचायत के बजाय दूसरे लोगों के हाथों में चला जाता है। इससे पंचायत केवल कागजों में निर्माण एजेंसी बनकर रह जाती है।सूत्रों का दावा है कि निर्माण कार्यों में कथित रूप से 20 से 30 प्रतिशत तक राशि कमीशन और अन्य व्यवस्थाओं में खर्च हो जाती है। इसके बाद शेष राशि में निर्माण कार्य पूरे किए जाते हैं। यदि ऐसा हो रहा है तो स्वाभाविक रूप से निर्माण की गुणवत्ता प्रभावित होगी और सरकारी धन का उद्देश्य भी अधूरा रह जाएगा।पंचायत चुनाव में अब कुछ ही महीने शेष हैं। ऐसे में कई जनप्रतिनिधि दबाव, विवाद या अन्य कारणों से खुलकर विरोध नहीं कर पा रहे हैं। परिणामस्वरूप वे अपने वैधानिक अधिकारों का उपयोग करने के बजाय मूकदर्शक बने हुए हैं। यह स्थिति पंचायत राज व्यवस्था की मूल भावना पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पंचायतों के अधिकार व्यवहार में किसी और के हाथों में चले जाएंगे, तो ग्राम पंचायतों को निर्माण एजेंसी बनाने का उद्देश्य क्या रह जाएगा? क्या संबंधित विभाग इस व्यवस्था की निष्पक्ष समीक्षा करेगा? क्या निर्माण कार्य वास्तव में पंचायतों द्वारा कराए जा रहे हैं या केवल दस्तावेजों में पंचायत का नाम उपयोग हो रहा है?

जनहित में उठते सवाल—

क्या पंचायतों को उनके वैधानिक अधिकारों के अनुरूप स्वतंत्र रूप से कार्य करने दिया जा रहा है?क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की निष्पक्ष जांच होगी?क्या तकनीकी स्वीकृति और निर्माण प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा की जाएगी?यदि कहीं अनियमितता है, तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी?यदि इन सवालों की समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर होगा और विकास कार्यों की पारदर्शिता पर जनता का भरोसा भी प्रभावित हो सकता है।

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