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क्या हम पुरुषों की पीड़ा सुनने के लिए तैयार हैं?

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     मोहिता जगदेव ,उग्र प्रभा समाचार

डॉ. संदीप गोहे, मनोवैज्ञानिक एवं पुरुष मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, सेव इंडियन फैमिली (एसआईएफ) बैतूल

पुणे के निकट हुई एक चर्चित हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया है। मीडिया रिपोर्टों में सामने आई जानकारी के अनुसार यह घटना केवल एक आपराधिक मामला भर नहीं है, यह हमारे समाज, रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं के सामने कई असहज सवाल भी खड़े करती है। इस प्रकरण की कानूनी सच्चाई का अंतिम निर्धारण न्यायालय करेगा, लेकिन एक मनोवैज्ञानिक और पिछले 12 वर्षों से पुरुष मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य करने वाले व्यक्ति के रूप में मेरे मन में एक प्रश्न लगातार उठ रहा है क्या हम पुरुषों की पीड़ा को उतनी गंभीरता से सुनते और समझते हैं, जितनी आवश्यकता है?

हमारे समाज में लड़कों का पालन-पोषण अक्सर इस सोच के साथ किया जाता है कि उन्हें मजबूत दिखना है, रोना नहीं है, भावनाओं को व्यक्त नहीं करना है और हर परिस्थिति में स्वयं को संभालकर रखना है। मर्द को दर्द नहीं होता जैसे वाक्य केवल कहावतें नहीं हैं, वे एक ऐसी सामाजिक मानसिकता को जन्म देते हैं, जिसमें पुरुष अपनी तकलीफों को भीतर ही भीतर दबाते रहते हैं। वे अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हैं, कार्यस्थल पर सक्रिय रहते हैं, मुस्कुराते हैं, लोगों से मिलते-जुलते हैं, लेकिन उनके भीतर तनाव, अपमान, अकेलापन और भावनात्मक टूटन का एक लंबा संघर्ष चलता रहता है।

जब किसी महिला के साथ अन्याय होता है तो समाज उसके समर्थन में खड़ा होता है, जो एक सकारात्मक और आवश्यक पहलू है। लेकिन जब कोई पुरुष मानसिक प्रताड़ना, भावनात्मक शोषण, रिश्तों में धोखे या सामाजिक उपहास का शिकार होता है, तब उसकी पीड़ा को अक्सर गंभीरता से नहीं लिया जाता। कई बार उसे कमजोर, असफल या परिस्थितियों के लिए स्वयं जिम्मेदार मान लिया जाता है। यही उपेक्षा उसे और अधिक अकेला बना देती है।

पिछले बारह वर्षों में पुरुष मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करते हुए मैंने ऐसे अनेक पुरुषों को देखा है, जो बाहर से सामान्य दिखाई देते थे, लेकिन भीतर से पूरी तरह टूट चुके थे। किसी ने अपनी नौकरी खोई, किसी ने अपना परिवार, किसी ने आत्मसम्मान और कुछ ऐसे भी रहे जिन्होंने जीवन से ही हार मान ली। सबसे अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि पुरुषों की मानसिक पीड़ा प्रायः तब दिखाई देती है, जब बहुत देर हो चुकी होती है। पुणे की यह घटना हमें यह सोचने के लिए भी मजबूर करती है कि हमारे रिश्तों की बुनियाद किस दिशा में जा रही है। क्या प्रेम अब साझेदारी के बजाय स्वामित्व का रूप लेने लगा है? क्या संवाद की जगह छल और ईमानदारी की जगह धोखे ने ले ली है? क्या हम भावनात्मक जिम्मेदारियों से बचने लगे हैं? इन प्रश्नों के उत्तर आसान नहीं हैं, लेकिन इन पर गंभीरता से विचार करना समय की आवश्यकता है।

यह लेख किसी व्यक्ति, किसी लिंग या किसी विशेष घटना के पक्ष अथवा विपक्ष में नहीं है। इसका उद्देश्य केवल उस मौन पीड़ा को सामने लाना है, जिसे हमारा समाज अक्सर सुनना नहीं चाहता। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े वर्षों से यह संकेत देते रहे हैं कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या अधिक है। यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं है, बल्कि हजारों अधूरी कहानियों, बिखरे हुए परिवारों और अनकहे दर्द की अभिव्यक्ति है।समय आ गया है कि पुरुष मानसिक स्वास्थ्य को विलासिता नहीं, सामाजिक आवश्यकता के रूप में स्वीकार किया जाए। ऐसे सुरक्षित मंच तैयार किए जाने चाहिए, जहां पुरुष बिना शर्म, संकोच या भय के अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकें। हमें यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि पुरुष भी दुखी होते हैं, टूटते हैं, रोते हैं और उन्हें भी सहारे, संवाद और उपचार की आवश्यकता होती है।एक संवेदनशील समाज की पहचान महिलाओं के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से नहीं होती, इस बात से होती है कि वह हर पीड़ित व्यक्ति की आवाज सुनने और समझने का साहस रखता है। पुणे की यह घटना समय के साथ समाचारों से ओझल हो सकती है, लेकिन यदि इसने हमें पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक सुरक्षा और रिश्तों में ईमानदारी के महत्व पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित किया, तो शायद इस दुखद घटना से समाज कोई सार्थक सीख ले सकेगा। क्योंकि किसी भी व्यक्ति की मौत केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, वह समाज से एक सवाल पूछकर जाती है। और वह सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हम उसे सुनने के लिए तैयार हैं?

मन की उलझन रिश्तों की पीड़ा या भावनात्मक तनाव से जूझ रहे पुरूष गोपनीय परामर्श एवं सहयोग के लिए हेल्पलाइन नंबर 8882498498 पर संपर्क कर सकते हैं

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