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इमोशनल लेथार्जी हमेशा डिप्रेशन नहीं होती: डाॅ संदीप गोहे

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        मोहिता जगदेव

 उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

*Emotional Lethargy: तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में बढ़ती भावनात्मक सुस्ती*

डॉ.संदीप गोहे,मनोवैज्ञानिक व मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ

उग्र प्रभा समाचार, छिंदवाड़ा :आज का समय तेज़ रफ्तार का है, लेकिन इस भागदौड़ के बीच मन लगातार थकता जा रहा है। लोग अपने काम समय पर कर रहे हैं, जिम्मेदारियाँ निभा रहे हैं और सामाजिक बातचीत भी कर रहे हैं, फिर भी भीतर एक अजीब-सी सुस्ती और खालीपन महसूस हो रहा है। मनोविज्ञान की भाषा में इस स्थिति को इमोशनल लेथार्जी कहा जाता है। यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसमें व्यक्ति भावनाए तो महसूस करता है, लेकिन उनमें पहले जैसी ऊर्जा नहीं रह जाती।

इमोशनल लेथार्जी कोई बीमारी या क्लीनिकल डायग्नोस्टिक नहीं है, यह एक साइकोलॉजिकल स्टेट है। इसमें खुशी, दुख, उत्साह और संवेदनाए सब कुछ धीमी और सपाट लगने लगती हैं। प्रतिक्रिया देने में देर होती है और भीतर लगातार मानसिक थकावट बनी रहती है। कई लोग कहते हैं कि कुछ महसूस ही नहीं हो रहा, जबकि वास्तव में भावनाए मौजूद होती हैं, बस कमजोर पड़ जाती हैं।

इमोशनल लेथार्जी लंबे समय से दबाई गई भावनाओं का परिणाम है। जब व्यक्ति लगातार मजबूत बने रहने की कोशिश करता है और अपनी भावनाओं को नजरअंदाज करता है, तो उसकी इमोशनल रिस्पांस  धीरे-धीरे कम हो जाती है। यह संकेत है कि मन को अब विश्राम, अभिव्यक्ति और सहयोग की जरूरत है।

डॉ.संदीप गोहे, मनोवैज्ञानिक व मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि लंबे समय तक तनाव, भावनात्मक दबाव, बर्न आउट और खुद के लिए समय न निकाल पाना इस स्थिति को जन्म देता है। इमोशनल लेथार्जी हमेशा डिप्रेशन नहीं होती, लेकिन यदि यह लंबे समय तक बनी रहे तो पेशेवर सहायता जरूरी हो जाती है। समय रहते इसे समझना और स्वीकार करना मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है।

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