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कविता के परंपरागत मुहावरे को बदलने वाले विष्णु खरे

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         मोहिता जगदेव

  उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

खरे जी के भीतर एक विस्फोटक तार्किकता थी जिससे बड़े बड़े रचनाकार घबराया करते थे:मोहन कुमार डहेरिया 

विष्णु खरे की कविताओं में अक्सर जाँच-पड़ताल,उधेड़बुन और मनुष्य बने रहने की चरम जद्दोजेहद चलते रहती है: दिनेश भट्ट

खरे जी का काव्य संसार गद्यांत्मक होते हुए भी अत्यंत व्यापकता और सघनता लिये हुये है:ओमप्रकाश नयन 

उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा:09 फ़रवरी 1940  में जन्मे,  विश्व दृष्टि संपन्न प्रख्यात कवि, आलोचक, पत्रकार, एवं  फ़िल्म समीक्षक, श्री विष्णु खरे जी को याद करते हुए विष्णु खरे स्मृति आयोजन, 8 फरवरी 2026, रविवार को स्थानीय हिन्दी प्रचारिणी समिति परिसर में आयोजित किया गया। प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित यह कार्यक्रम हिन्दी प्रचारिणी समिति के सहयोग से सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत ओशीन धारे द्वारा खरे जी की डरो कविता की संगीतमय प्रस्तुति के साथ हुई। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए श्री हेमेंद्र कुमार राय ने कहा कि विष्णु खरे अपनी कविताओं में दर्शक की भूमिका में रहते हैं,समाज में सत्ता द्वारा निर्मित दमन और शोषण की स्थितियों के विरुद्ध प्रतिरोध को स्वर देते हैं। वे अपने लिए किसी करुणा या सहानुभूति की मांग नहीं करते बल्कि पाठकों दर्शकों में अमानवीय स्थितियों से निकलने के लिए संघर्ष की भूमिका तैयार करने का काम करते हैं। श्री गोवर्धन यादव जी ने कहा ऐसे विश्व दृष्टि संपन्न साहित्यकार का सामिप्य मिलना, मेरे लिए बड़े सौभाग्य की बात है. दिल्ली के कोलाहल से अपने आपको बचाते हुए वे बीच-बीच में छिन्दवाड़ा आ जाया करते थे। यहाँ रहते हुए आपने कई पुस्तकें लिखीं । श्री दिनेश भट्ट ने अपनी बेबाक प्रवृत्ति , बौद्धिक-वक्तृत्व प्रवणता और वैचारिक प्रखरता का  योद्धा विष्णु खरे के साथ उनके किराए के छोटे कमरे में जब हम हिंदी साहित्य और विश्व साहित्य के प्रभामंडल को महसूस करते तो सारे महानगर फीके लगते।  ज्ञानरंजन ने उन्हें कठिन और समर्थ  कवि कहा है। उनकी कविताओं में अक्सर जाँच-पड़ताल , उधेड़बुन और मनुष्य बने रहने की चरम जद्दोजेहद चलते रहती है। विष्णु जी की शख्सियत ऐसी थी कि लोग उनसे या तो प्यार करते थे या डरते थे । खरे जी की कविताओं का पाठ डाॅ. मनीषा जैन, श्रीमती निर्मला घई, श्रीमती ज्योति गुप्ता, श्रीमती मोहिता जगदेव द्वारा किया गया।  श्री मोहन कुमार डहेरिया ने कहा कि खरे जी ने कविता के परंपरागत मुहावरे को एक नया आयाम दिया, उनके भीतर एक विस्फोटक तार्किकता थी जिस से बड़े बड़े रचनाकार घबराया करते थे, उनकी कविता गुंग महल आज के दौर की बढ़ती साम्प्रदायिकता से लड़ने के लिए एक महत्वपूर्ण हथियार है।


श्री ओम प्रकाश नयन ने कहा कि विष्णु खरे के व्यक्तित्व व कृतित्व की सीमाएं देश की सीमाओं को पार करती हुई विश्व की अपार सीमाओं तक विस्तृत हैं. विविध विधाओं में एक साथ सिद्धहस्तता उनकी सृजनात्मक प्रतिभा की परिचायक हैं. उनका काव्य संसार गद्यांत्मक होते हुए भी अत्यंत व्यापकता और सघनता लिये हुये है। श्री देवेन्द्र उपासनी जी ने क किताब का के अंतर्गत खरे जी की किताबों के पोस्टर्स प्रदर्शित किए, चित्रकार ध्रुव जी ने विष्णु खरे जी का मनमोहक पोस्टर प्रदर्शित किया। हिन्दी प्रचारिणी साहित्य सचिव ने कहा कि खरे जी की कविताओं से मैंने अपने जन्म के पहले के छिंदवाड़ा को जाना। बाल साहित्यकार प्रभु दयाल श्रीवास्तव जी ने विष्णु खरे जी के कृतित्व पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन शेफाली शर्मा ने किया। श्री रणजीत सिंह परिहार, श्रीमती कमला शर्मा, श्री अमर सिंह, श्री लक्ष्मण प्रसाद डहेरिया, श्री रामलाल सराठे, श्री राजेन्द्र यादव, श्री सुरेन्द्र वर्मा, श्री राजकुमार चौहान, श्री सचिन वर्मा, श्री अमित सोनी,श्री विश्वेष चंदेल, सुश्री अंजुमन आरज़ू, श्रीमती अनुराधा तिवारी, श्री चंद्रशेखर उसरेठे, श्री चंद्रभान साहू विशेष रूप से उपस्थित रहे।

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