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भारतीय सिने-संस्कृति और फिल्म संगीत की विविधता ने दर्शकों को किया प्रभावित

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          मोहिता जगदेव

   उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा

सुप्रतिष्ठित फिल्म विश्लेषकों श्रीराम ताम्रकर व सुनील मिश्र के अवदान पर केंद्रित दो दिवसीय स्मृति प्रसंग समारोह संपन्न

   रपट - ओमप्रकाश नयन 

उग्र प्रभा समाचार, छिन्‍दवाड़ा: 16 दिसंबर 2025/ संस्कृति विभाग द्वारा 13 से 14 दिसंबर 2025 को सुप्रतिष्ठित फिल्म विश्लेषकों श्रीराम ताम्रकर व सुनील मिश्र के अवदान पर केंद्रित दो दिवसीय स्मृति प्रसंग समारोह छिंदवाड़ा के शासकीय मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में संपन्न हुआ। जिला प्रशासन, एवं शासकीय मेडिकल कॉलेज छिदवाड़ा के सहयोग से संपन्न इस कार्यक्रम में जहां 2 फिल्मों व 2 नाटकों का प्रदर्शन किया गया, वही विद्वान वक्ताओं ने भारतीय सिने-संस्कृति और फिल्म संगीत की विविधता को प्रभावशाली ढंग से रखा। इस आयोजन में जितनी अच्छी प्रस्तुतियां थीं, वहीं दर्शकों की कमी ने आयोजन पर प्रश्नचिन्ह भी लगाया। संभवत: व्यापक प्रचार-प्रसार की कमी के कारण जिले के संगीतप्रेमी, नाट्यप्रेमी, साहित्यप्रेमी, पत्रकार और आम जन एक अच्छे कार्यक्रम का लाभ लेने से वंचित रह गये । 

         आयोजन के प्रथम दिन की शुरुआत नासिर हुसैन द्वारा निर्देशित 1971 की लोकप्रिय फिल्म “कारवाँ” के प्रदर्शन से हुई। आशा पारेख, जितेन्द्र, अरुणा ईरानी और हेलन अभिनीत यह फिल्म अपनी रोचक कथा और मधुर संगीत के कारण 1979 में चीन में रिलीज होने पर वहाँ की सबसे अधिक कमाई करने वाली विदेशी फिल्म बनी थी। दर्शकों ने फिल्म के सस्पेंस और भावपूर्ण दृश्यों की सराहना की। इसके बाद निगर पालिक निगम छिंदवाड़ा महापौर श्री विक्रम अहके, जिला भाजपा अध्यक्ष श्री शेषराव यादव ने अन्य अतिथियों के साथ दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। प्रथम दिन के व्याख्यान में वरिष्ठ लेखक एवं फिल्म निर्माता डॉ. राजीव श्रीवास्तव ने “आरके स्टूडियो की फिल्मों की संगीतमय यात्रा” का विश्लेषण करते हुये कहा कि 40 के दशक में नौशाद द्वारा स्थापित संगीत परंपरा को राज कपूर ने अपनी कलात्मक दृष्टि से नई ऊँचाई दी। उन्होंने कहा कि राज कपूर की 1948 में प्रदर्शित पहली फिल्म “आग” भले ही व्यावसायिक रूप से सफल न रही हो, पर इसके गीतों ने दर्शकों के बीच गहरी छाप छोड़ी, किन्तु 1949 की फिल्म “बरसात” को भारतीय फिल्म संगीत में नया परिवेश गढ़ते हुये राज कपूर की फिल्मों में संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कथा का अभिन्न अंग होता गया। उन्होंने “जिस देश में गंगा बहती है” के निर्माण से जुड़े रोचक प्रसंग साझा किए और बताया कि किस तरह राज कपूर ने गीत-संगीत के माध्यम से कथानक को नई संवेदना प्रदान की। उन्होंने अपने व्याख्यान के दौरान फिल्मों के गानों को विजुअल रूप से उदाहरण स्वरूप प्रस्तुत करते हुये नये तरह से संगीत और कथानक की यात्रा का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। इसी प्रकार पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एवं लेखक श्री पंकज राग ने नासिर हुसैन की फिल्मों के कालजयी संगीत पर विस्तार से प्रकाश डालते हुये कहा कि नासिर हुसैन की फिल्मों में युवापन, लय और रोमांस का अनोखा संगम दिखाई देता है, जिसने हिंदी फिल्म संगीत को स्थायी पहचान दी। नासिर हुसैन ने आर.डी. वर्मन और अन्य संगीतकारों के माध्यम से अपनी फिल्मों में संगीत की एक नई मेलोडी प्रस्तुत की, जिसे दर्शकों ने बहुत ही सराहा।

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      दूसरे दिन का आयोजन ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में 1969 में बनी फिल्म “सत्यकाम” के प्रदर्शन से प्रारंभ हुआ। इस फिल्म में धर्मेन्द्र, संजीव कुमार, शर्मिला टैगोर एवं अशोक कुमार ने मुख्य भूमिका निभाई है। यह फिल्म एक बंगाली उपन्यास पर आधारित है। फिल्म में लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने संगीत दिया है। फिल्म में अभिनेता धर्मेन्द्र के निभाए किरदार को भारतीय सिनेमा में सर्वेश्रेष्ठ किरदारों में से एक माना जाता है। इस फिल्म ने हिंदी में सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता था।

        अगले सत्र में इंदौर के श्री समय ताम्रकर ने “ए.आई. और सिनेमा का भविष्य- कला एवं तकनीक” विषय पर चर्चा करते हुये कहा कि एआई जितना बड़ी चुनौती के रूप में आज खड़ा है, उतना सिनेमा ने अपने 100 साल के इतिहास में पहले कभी नहीं देखा। यह दौर कला और तकनीक के बीच सिर्फ बहस का नहीं, टकराव का समय है। उन्होंने कहा कि एआई अब केवल उपकरण नहीं रहा, ये स्क्रिप्ट लिखता है, चेहरे बनाता है, आवाजें पैदा करता है, सेट रचता है और पूरा कैमरा शॉट जेनरेट कर देता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि आज एआई से टीवी सीरियल और छोटी फिल्में बन रही हैं। आज वो प्रोजेक्ट्स हमें कमजोर लगते हैं, लेकिन दो साल बाद यही हमारी बराबरी करेंगे और चार साल बाद प्रतियोगी बन जाएंगे। इससे नौकरियों, पहचान और कॉपीराइट पर गहरा संकट होगा। खतरे की बात करते हुए उन्होंने एक दूसरी, उलटी सच्चाई भी सामने रखी कि पहली बार ऐसा हुआ है कि बिना पैसे वाला आदमी भी फिल्म बना सकता है। गाँव का बच्चा भी एआई से शॉर्ट फिल्म बना सकता है, लेखक अपनी कल्पना को पूरा विजुअल रूप दे सकता है। उन्होंने कहा कि एआई ने फिल्म निर्माण को लोकतांत्रिक बना दिया है जो संसाधन पहले सिर्फ बड़े प्रोड्यूसर्स के पास थे, अब हर क्रिएटर की जेब में हैं। उन्होंने कहा कि ए.आई. जरूर एक ताकत बनकर उभरा है, किन्तु उसमें संवेदना नही है, जबकि कला हमेशा जीवित रहेगी। इसी प्रकार इंदौर के श्री अरुण ठाकरे ने “धर्मेन्द्र – संघर्षों से सुपरस्टार तक” विषय पर चर्चा करते हुये कहा कि धर्मेन्द्र जी ने पहली फिल्म शहीद देखी तो वे विस्मय से भर उठे और कहा कि यही मेरी जिंदगी होनी चाहिए। अनेक सपने लेकर वे बंबई चले आए। धर्मेन्द्र जी बंबई आए तब भारतीय सिनेमा पर दिलीप कुमार, राजेन्द्र कुमार और मनोज कुमार जैसे महान अभिनेताओं का गहरा प्रभाव था, लेकिन उन्होंने किसी अभिनेता की नकल नहीं की। उन्होंने अपनी लकीर खींची और उसी पर आगे बढ़ते रहे। भारत में यदि जेम्स बॉन्ड फिल्म बनती तो धर्मेन्द्र ही सर्वश्रेष्ठ नाम होते। उनका मर्दाना सौंदर्य उनकी ही-मैन छवि इतनी बड़ी हो गई है कि उनके अभिनय के अनंत विस्तार और स्वाभाविकता पर उसकी छवि आ पड़ी है, जबकि जीवन के हर रंग को उन्होंने पर्दे पर बखूबी उतारा। 

     आयोजन के प्रथम दिन स्व. सुनील मिश्र द्वारा लिखित नाटक “गजमोक्ष” का प्रभावपूर्ण मंचन विनोद कुमार मिश्रा के निर्देशन में किया गया। लगभग एक घंटे की इस प्रस्तुति में अनेक कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से यह संदेश दिया कि “शक्ति का सही मान तभी है, जब उसके साथ संयम, विवेक और करुणा भी हो।” हाथी के जीवन से प्रेरित इस नाटक में मनुष्य के लोभ, पाप और उसके परिणामों को संवेदनशील ढंग से दर्शाया गया। दर्शकों ने नाटक की कथा, संवाद और प्रस्तुति को अत्यंत सराहा। इस नाटक में रीवा के कलाकार अमित पांडे ने अपने अभिनय से दर्शकों की वाहवाही लूटी। इसी प्रकार दूसरे दिन स्व. सुनील मिश्र के नाटक “ऐसे रहो की धरती” का मंचन हुआ। आनंद प्रकाश मिश्रा के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक की भी दर्शकों ने सराहना की। यह नाटक एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो परिस्थितियो के कारण हिंसक बन जाता है और वह समाज को ही परेशान करने लग जाता है। जो उसे बचपन से जानते हैं वह भी दया करने के बजाय उसे घृणा की दृष्टि से देखते हैं। नाटक का आरंभ नानी के घर से होता है, जिनके पड़ोस में तिलकू नाम का बदमाश रहता है। रात को वह घर में आता है और अपने घर का दरवाजा बंद कर चुपचाप सो जाता है। जब सुबह उठता है तो उसके तीन-चार आदमी उसके पीछे-पीछे चलने लगते हैं। दिनभर बाजार में घूमते हैं और लोगों से लूट-खसोट करते हैं। डर के कारण किसी व्यक्ति की हिम्मत नहीं होती कि उनके खिलाफ बोल सकें। एक पुलिस ऑफिसर तिलकू के पीछे लग जाता है, लेकिन उसे रंगे हाथों पकड़ नहीं पाता। घर में नानी बताती है कि उसका बचपन बहुत मुश्किलों में बीता है, जिसके कारण वह ऐसा बन गया।

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