मोहिता जगदेव
उग्र प्रभा समाचार ,छिंदवाड़ा
"भारतीय संविधान जन भावनाओं का विधिक दस्तावेज़ है": प्रो. सकर लाल बट्टी
"संवैधानिक मूल्यों को सहेजने से भारत का पुनर्निर्माण संभव है ": प्रो. अमर सिंह
"समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता व लोकतांत्रिक मूल्य संविधान के केंद्र में हैं": प्रो. अमर सिंह
उग्र प्रभा समाचार,छिंदवाड़ा: शासकीय महाविद्यालय चांद में संविधान दिवस पर भारतीय संविधान लोकतांत्रिक अधिकारों की आत्मा विषय पर आयोजित व्याख्यान में मुख्य अतिथि वक्ता बतौर बोलते हुए विभागाध्यक्ष राजनीतिशास्त्र प्रो. सकरलाल बट्टी ने कहा कि भारतीय संविधान भारत के करोड़ों लोगों की भावनाओं का विधिक दस्तावेज़ है। यह अपने समग्र रूप में समावेशी, समतामूलक व अंत्योदय के अधिकारों की वकालत करता है। प्राचार्य प्रो. अमर सिंह ने कहा कि संवैधानिक आदर्शों को सहेजने से भारत का पुनर्निर्माण संभव है। समाजवाद, धर्म-निरपेक्षता व लोकतांत्रिक मूल्य संविधान के केंद्र में हैं।
प्रो. रजनी कवरेती ने कहा कि संवैधानिक व्यवस्था में स्वतंत्रता व समानता स्थापित करके लोगों के बीच द्वेष दूर कर भाईचारे को विकसित करना है। प्रो. जी. एल. विश्वकर्मा ने कहा कि संविधान में जनतंत्र की शांति, उन्नति व समृद्धि के लिए नागरिकों के अधिकार व कर्तव्यों के बीच तालमेल होने की खूबी है। प्रो . राजकुमार पहाड़े ने संविधान में सामाजिक आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की आज़ादी से मानव मूल्यों की प्रतिष्ठा को रेखांकित किया। प्रो. लक्ष्मण उइके ने संविधान में राष्ट्र की एकता व अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता की भावना को दृढ़ संकल्पित होकर भारत के नवनिर्माण को निरूपित किया। प्रो. रक्षा उपश्याम ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारतीय संविधान में यह विधिक प्रावधान है कि किसी भी नागरिक को धर्म, वंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी सामाजिक सुविधा या विशेषाधिकार के उपभोग से वंचित नहीं किया जाएगा।

