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आदिवासी छात्रावासों में अव्यवस्था और शोषण अधीक्षक सुनील कुमार सोनी पर छात्रों की पिटाई के आरोप

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आदिवासी छात्रावासों में अव्यवस्था और शोषण अधीक्षक सुनील कुमार सोनी पर छात्रों की पिटाई के आरोप 


 छिंदवाड़ा // उग्र प्रभा

जिले में संचालित अनुसूचित जाति एवं जनजाति आश्रम छात्रावासों में अव्यवस्थाएं और नियमों की अवहेलना थमने का नाम नहीं ले रही हैं। उच्च कार्यालय के आदेशों के बावजूद गैर आदिवासी शिक्षकों को अधीक्षक का प्रभार सौंपा जा रहा है। इसके चलते छात्र-छात्राओं की प्रताड़ना, पिटाई और यहां तक कि मृत्यु जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। 


आदेशों की अनदेखी और अधीक्षकों की मनमानी

भारत सरकार और मध्यप्रदेश शासन जनजातीय समाज के उत्थान के लिए विभिन्न योजनाएं चला रहे हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर छात्रावासों को लाभ का धंधा बना लिया गया है। अधीक्षक बनने के बाद कई शिक्षक न तो रात्रि विश्राम करते हैं और न ही छात्रों की देखभाल। जांच या मीडिया के सवालों पर बहानेबाज़ी कर जिम्मेदारियां टाल दी जाती हैं।

-आदिवासी छात्रों की बेरहमी से पिटाई का मामला

हाल ही में छिंदवाड़ा के सुक्लुढाना आदिवासी छात्रावास में अधीक्षक सुनील कुमार सोनी द्वारा चार छात्रों की बेरहमी से पिटाई कर छात्रावास से बेदखल करने का मामला सामने आया। छात्र दो दिन तक बारिश में भूखे-प्यासे भटकते रहे। बाद में अभिभावकों की शिकायत पर सहायक आयुक्त को लिखित आवेदन सौंपा गया। अब देखना होगा कि इस मामले में कठोर कार्यवाही होगी या राजनीतिक संरक्षण के चलते मामला दबा दिया जाएगा।

आयुक्त कार्यालय के आदेशों की खुलेआम अवहेलना

जनजातीय कार्य विभाग, मध्यप्रदेश द्वारा बार-बार आदेश जारी किए गए हैं कि अनुसूचित जाति-जनजाति छात्रावासों में केवल उन्हीं वर्गों के शिक्षकों को अधीक्षक का प्रभार दिया जाए। इसके बावजूद जिले के अधिकांश छात्रावासों में गैर अनुसूचित जाति-जनजाति शिक्षक प्रभारी बने हुए हैं। यही कारण है कि आदिवासी छात्रों की भाषा, रहन-सहन और परंपराओं की समझ के अभाव में शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं।

नियम के खिलाफ वर्षों से जमे अधीक्षक

नियम अनुसार किसी भी शासकीय शिक्षक को अधिकतम तीन वर्ष तक ही प्रभारी अधीक्षक बनाया जा सकता है, लेकिन जिले में कई शिक्षक वर्षों से पद पर जमे हुए हैं। वेतन शिक्षक का प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन शिक्षण कार्य से बच रहे हैं। अपने बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं जबकि गरीब मजदूर आदिवासी बच्चों का भविष्य अंधकार में धकेल रहे हैं।

विस्तार सें

*अधीक्षक सुनील कुमार सोनी पर  आदिवासी छात्रावास मै छात्रो को पिटाई के लगे आरोप

*आयुक्त कार्यलय आदेश के बाद भी जिले मै संचालित आश्रम जनजातीय छात्रावासो मै गैर आदिवासी शिक्षकों को अधीक्षक का प्रभार


जिले में संचालित अनुसूचित जाति एवं जनजाति आश्रम छात्रावासो मै अनियमितताओं उच्च कार्यलय के आदेशों की अवहेलना छात्रों की प्रताड़ना पिटाई मृत्यु जैसे मामले देखने को मिल रहे हैं। लचार व्यवस्था को सुधारने में प्रशासन नाकाम साबित होते दिखाई दे रहा है। भारत सरकार एवं मध्य प्रदेश सरकार जनजातियों के उत्थान के लिए तरह-तरह के स्कीम लागू कर रही हैं लेकिन जमीनी स्तर पर उनका भोग शोषण और कोई कर रहा है। आश्रम छात्रावासों को लाभ का धंधा मानकर अधीक्षक बनने की होड में शिक्षक दिखाई दे रहे हैं। अधीक्षक का प्रभार पाते ही अनियमिताओं का दौर शुरू हो जाता है छात्रावास में रात्रि विश्राम नहीं करना दिन भर नदारत रहना आम नागरिक या मीडिया के पहुंचने पर कर्मचारियों के द्वारा जनमन कार्यक्रम सर्वे या किराना सामग्री खरीदने की बात कह कर बाहर होना बताया जाता है। जब उच्च कार्यालय से उनकी मीटिंग या सर्वे के बारे में पूछा जाता है तो साफ मना कर दिया जाता है कि रोज-रोज नहीं बुलाया जाता।यह समास्या रोज देखने को मिल रही है। जबकी अधीक्षक अधीक्षिकाओ की जिम्मेदारी रहती चौबीस घंटे छात्रावासो मै रहकर छात्र छात्राओं की निगरानी और सुरक्षा खान पान का ध्यान रखना। वहा छात्र छात्राओं के माता-पिता नही रहते जो बच्चो पर ध्यान रख सके। अधीक्षक अधीक्षिका ही अभिभावक की जिम्मेदारी मै रहते हैं। लेकिन यह कही देखने को नही मिल रहा है।

सिर्फ शिक्षक अपनी जिम्मेदारी मूल पद कर्तव्य से भटक कर सुकून आराम और अन्य लाभ की अपेक्षा रखकर शिक्षण कार्य सें मुक्त होकर प्रभारी अधीक्षक बनने की जुगत मै राजनीतिक संरक्षण धनवल के सहयोग से जिम्मेदारी पा रहे है। 

आदिवासी छात्रों को अधीक्षक के द्वारा बेहरमी से पिटने का मामला आया सामने

हाल ही मै सुक्लुढाना छिंदवाड़ा आदिवासी छात्रावास मै चार छात्रों को अधीक्षक सुनील कुमार सोनी के द्वारा बेरहमी से पिटने का मामला सामने आया और छात्रावास से बेदखल किया गया।बताया गया दो दिन से बारिश मै छात्र बहार भूखे प्यासे भटकते रहे। बाद मै अभिभावकों को सूचना मिलने के बाद पहुचें और बच्चों के साथ लिखित आवेदन पत्र देकर सहायक आयुक्त से शिकायत की अब देखना होगा अधीक्षक पर क्या कार्यवाही होती है या राजनीतिक संरक्षण और मिलीभगत से यथावत रहेगें या भोले भाले गरीब आदिवासी मजदूर के इन बच्चों का शोषण प्रताड़ना के लिए बरकरार रखा जायेगा। इन छात्रावास मै गरीब मजदूर आदिवासी के बच्चे रहते हैं जो घर से सम्पन्न होते वो भूलकर भी ऐसे  छात्रावासो मै अपने बच्चो को नही रखते हैं।

आयुक्त कार्यलय का आदेश अनुसूचित जाति जनजाति छात्रावासो मै गैर अनुसूचित जाति जनजाति अधीक्षक नही

मध्यप्रदेश जनजातीय कार्य विभाग आयुक्त कार्यलय से सम्पूर्ण मध्यप्रदेश के लिए आदेश समय समय पर जारी होते रहे है। जिसमें उल्लेख किया गया है जिले में संचालित अनुसूचित जाति जनजाति आश्रम छात्रावासो मै अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के शिक्षक को ही अधीक्षक का प्रभार सौपा जाय। लेकिन यहा आयुक्त कार्यलय के आदेशो की अवहेलना की जा रही है। जिले के सभी विकासखंडो मै देखा जाय तो गैर अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के शिक्षकों के हाथों मै आश्रम छात्रावासो की कमान है जो नियम के विरुद्ध है।कब आयुक्त के आदेशो का पालन होगा।

छात्रावासो मै घट रही घटनाओं का कारण है। आदिवासी जनजातीय समुदाय की रीति रिवाज खान पान रहन सहन रंग रुप भेद-भाव रहित व्यावहार सिर्फ अनुसूचित जाति जनजाति समुदाय के शिक्षक ही भांलि भांति समझ सकते हैं। इस कारण मध्यप्रदेश शासन के बडे स्तर के अधिकारियों के द्वारा नियम आदेश तैयार किया जाता है।लेकिन शासन स्तर के आदेशो का ठेंगा दिखाकर अनुसूचित जाति जनजाति बच्चों का शोषण किया जा रहा है।

तीन बर्ष तक ही रह सकते हैं प्रभारी अधीक्षक उसके बाद शिक्षण कार्य का है आदेश


मध्यप्रदेश शासन जनजातीय कार्य विभाग द्वारा संचालित जनजातीय आश्रम छात्रावासो के संचालन के लिए शासकीय शिक्षक को अधिकतम तीन बर्ष के लिए अधीक्षक पद के लिए प्रभार सौपने का आदेश है। लेकिन कुछ मठाधीश कुंडली मारकर अधीक्षक के पद पर जमे हुए हैं। जो नियम के विरुद्ध है।और उच्च अधिकारियों के आदेश की अवहेलना है। शिक्षण कार्य से बच रहे हैं जबकि वेतन शिक्षक का प्राप्त कर रहे। जो दूसरो के बच्चों के नाम से रोजी रोटी कमाने वाले गरीब मजदूर के बच्चों को अंधकार मै डालकर अपने बच्चों को निजी स्कूल मै शिक्षा दिला रहे हैं। क्योकि स्वयं के आत्मविश्वास पर भरोसा बचा नही। दस हजार रुपये वेतन मिलने वाले प्राईवेट शिक्षको से अपने बच्चो के भविष्य संभाल रहे है।


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